Gunāhoṃ kā devatā

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Bhāratīya Jñānapīṭha, 2009 - 248 pages
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भावनाओं से सीधे जुड़ने वाली इस कालजयी कृति को पढ़ने के दौरान आप भावनाओं की लहरों में न डूबें, एेसा असंभव है। आंखें नम होंगी। धड़कनें असंयत होंगी और उत्सुकता दर उत्सुकता बढ़ती जाएगी। धर्मवीर भारती ने पात्रों की रहस्यमयी चारित्रिक विशेषता यूं गढ़ी है, जैसे वो उनमें रचे-बसे हैं। अंत ऐसा, जिसकी किसी पाठक ने कल्पना न की होगी। बिल्कुल ऐसी, जिसकी प्रत्याशा न हो। चंदर, सुधा, बिनती व पम्मी जैसे चरित्र आज दशकों बाद भी प्रासंगिक लगते हैं। सच में कालजयी कृति है ‘गुनाहों का देवता’।-राकेश कुमार सिंह, बक्सर (बिहार)-मो. 9472499955 

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