Sangeet Ratnakar

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Rajkamal Prakashan Pvt Ltd
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भारतीय शास्त्रीय संगीत के शास्त्रों की इंटरनेट पर उपलब्धता न के बराबर है,जो है भी वो कहीं से पूर्ण नहीं है. इस किताब को देखकर हार्दिक प्रसन्नता हो रही है,अपलोड करने वाले का हार्दिक आभार

Contents

Section 1
4
Section 2
7
Section 3
9
Section 4
19
Section 5
23
Section 6
31
Section 7
43
Section 8
62
Section 10
108
Section 11
119
Section 12
122
Section 13
126
Section 14
169
Section 15
240
Section 16
251
Section 17
260

Section 9
66
Section 18
280

Common terms and phrases

अंगुल अंश अतएव अन्य अर्थ अर्थात अलवर इन इस प्रकार इसका इसके इसमें उल्लेख उस उसके उसे एक अध्ययन और कर करना करने कस्तिनाथ ने कहते हैं कहा गया कहा जाता है कहा है कि का व्यवहार किया किया गया है किया जाता किया है की कुछ के बाद के साथ को गा गांधार गान गीत गुरु ग्रह चार जा जाति जो ठी तार ताल तीन तृतीय तो था थे दो द्वारा द्वितीय धा धुव नहीं है नामक नि निषाद ने कहा है पंचम पकी पद पा पु प्रथम प्रयोग होता है भाषा भी भेद मत मा में यह या युक्त ये राग रि री रूप में रूप से रे लघु वजिते वर्ण वह विकृति वीणा शब्द श्रुति संगीत संबंध में सब समय सा से सोता स्वर स्वरों ही हुई हुए हे है एवं हैं होगा होता है होती होते होने पर

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