Bhakt Prahlad

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Suruchi Prakashan - 24 pages
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अग्नि अत अपनी अपने अब अभी इन्द्र इस इसी ईश्वर उनका उनके उन्हें उन्होंने उसका उसकी उसके उसने उसी उसे एक ऐसा और कथा कर करता करना करने करें का कि किया किसी की कुछ के पास के रूप में के लिये कोई क्या क्यों गये गुरुजनों ने चाहता जब जो तक तीनों तुम तुमने तुम्हारे तुम्हें तो था थी थे दिया देवता दो नहीं नहीं है नाम नारद नृसिंह के पर परन्तु पिता पुत्र पूछा पृथ्वी प्रसन्न प्रहलाद को प्राप्त फिर बहुत बात बाद बेटा ब्रह्मा भक्त भगवान् भय भारत भी मन में माता मार मार्ग मुझे मृत्यु मेरी मेरे मैं यह युद्ध रहा राक्षसों के राजा लगा लगे ले लेकिन वरदान वराह वह विचार विष्णु वे शत्रु शुक्राचार्य श्रीहरि सभी समय समाप्त सर्वश्रेष्ठ सामने सिखाया सुनकर से हम हमें हिरण्यकश्यप ने हिरण्याक्ष ही हुआ हुई हुए हूँ हे है है और हैं हो गया होकर होने होली

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