काँच के टुकड़े (Hindi Sahitya) Kanch ke Tukde (Hindi Stories)भारतीय संस्कृति में पौराणिक आख्यानों, जातक कथाओं, हितोपदेश और पंचतन्त्र इत्यादि के अलावा,दादा-दादी, नाना-नानी की काल्पनिक परीकथाओं के रूप में उपस्थित कहानी हिन्दी वाङ्गमय की सबसे महत्वपूर्ण विधा है। हातिमताई, तोता मैना, सिंहासन बत्तीसी और बेताल पचीसी की कहानियाँ आज भी लोकजीवन और जन-मानस में बड़ी गहराई से समाई हैं। खड़ी बोली में आधुनिक हिन्दी कहानी की शुरुआत के बारे में विद्वतजन एकमत नहीं दिखते हैं। कतिपय विद्वान पत्रिका ‘सरस्वती’ में छपी ‘इन्दुमती’ को पहली हिन्दी कहानी कहते हैं परन्तु अधिकांश विद्वान इंशा अल्ला खाँ की ‘रानी केतकी की कहानी को पहली हिन्दी कहानी मानते हैं। भारतेन्दु युग से वैज्ञानिक सोच के प्रभाव के कारण कहानी में बदलाव प्रारम्भ हुआ और मुंशी प्रेमचन्द तक आते-आते को कायाकल्प हो गया। प्रेमचन्द की यथार्थपरक, पूँजीवाद, ग़रीबी इत्यादि सामाजिक समस्यामूलक और स्वाभाविक मनोविज्ञान आधारित कहानियों की प्रासंगिकता व सहज,सरल भाषा ने प्रेमचन्द को कहानी सम्राट और कहानियों को लोगों का कंठहार बना दिया। अगर कहानी की अभिव्यक्ति-सामर्थ्य की बात करें तो पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की एक ही कहानी ‘उसने कहा था’ का उदाहरण ही पर्याप्त होगा जिसका नायक ‘लहना सिंह’ और ‘तेरी कुड़माई हो गयी?’ का प्रारम्भिक संवाद पाठकों को आज भी याद है। स्वतंन्त्रता पूर्व अविभाजित लाहौर में जन्मीं, शिमला में पली-बढ़ीं और चण्डीगढ़ में शिक्षित, वर्तमान में अमेरिका प्रवासी सुदर्शन प्रियदर्शिनी बहुमुखी रचनाकार हैं। उनके कई उपन्यास, कहानी संग्रह व कविता संग्रह प्रकाशित ही नहीं पुरस्कृत और सम्मानित हो चुके हैं तथा वह प्रवासी होकर आज भी निरन्तर हिन्दी की सेवा में सृजनरत हैं और आत्मकथा लिख रही हैं। ‘काँच के टुकड़े’ उनका नवीनतम कहानी संग्रह है जिसमें किशोरावस्था से प्रौढ़ावस्था की कहानियाँ शामिल हैं। नैसर्गिक, आदर्शोन्मुख कहानियों की सम्यक् कथावस्तु, सामाजिक सरोकार, सहज-सरल व स्भाभाविक प्रवाहपूर्ण भाषा पाठकों से तादात्मय स्थापित करने में सक्षम दिखाई देती है। संग्रह की प्रारम्भिक तीन चौथाई कहानियाँ किशोरावस्था तथा एक चौथाई कहानियाँ प्रौढ़ावस्था में लिखी गई हैं। अतः प्रारम्भिक और उत्तरार्ध की कहानियों के तुलनात्मक विवेचन द्वारा उनकी कथा-यात्रा की प्रगति का भी अंदाजा लगाया जा सकता है। उन्हें संग्रह के प्रकाशन की हार्दिक बधाई। ईश्वर उनकी सृजनात्मक यात्रा को निरन्तरता प्रदान करे। इन्हीं शुभकामनाओं सहित- राजेन्द्र तिवारी कानपुर |
Contents
Section 1 | 19 |
Section 2 | 40 |
Section 3 | 50 |
Section 4 | 54 |
Section 5 | 59 |
Section 6 | 63 |
Section 7 | 68 |
Section 8 | 75 |
Section 9 | 77 |
Section 10 | 79 |
Section 11 | 97 |
Section 12 | 103 |
Section 13 | 112 |


