Antarnaad: अंतर्नाद

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"अंतर्नाद"देश काल और समाज का असली चेहरा दिखाता दर्पण है। रोज की घटनाओं से आजिज हर दिल से निकली चीत्कार है। समाज का विद्रूप चेहरा है, भूख बेरोजगारी से मरने की लाचारी है। भूख में जिस्म बेचने की मजबूरी है। कुर्सी सत्ता और सियासत की डर्टी पॉलिटिक्स है। धरती और पर्यावरण की करुण गाथा है। पाकिस्तान का नापाक आंतकी इरादा है। रिश्तों की टूटी मर्यादा है। वोटतंत्र, नोटतंत्र के बीच देशभक्ति की रसधार है। देश समाज को बचाने की ईश्वर से पुकार है।


सोये देश को जगाने का शंखनाद करती अंतर्नाद में हास्य व्यंग्य का भी समावेश है ताकि बोझिल मन को हंसी के ठहाकों से चन्द पलों की खुशी मिल जाय। उम्मीद है हास्य और व्यंग्य का गुलदस्ता आपके मन को सुकून देगा। आपके प्यार और बहुमूल्य विचार का रहेगा इंतजार.....

आपका
पंकज भूषण पाठक "प्रियम"
 

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अदालत अधिकार अपना अपनी अपने अब अरे आज आबादी आया इन इस ईश्वर उस उसे एक और कभी कर करते कहां का किया की की खातिर कुछ के केसा ये केसी कैसा को कोई क्या क्यूं खड़ा खुद खूब गयी गरीब घर जग जब जहां जाती जान जिसने जीवन जो ठंड तक तब तभी तुम तू तूने तेरी तो था थी थे दर्द दानव दिया दिल दुनिया दे देख देखा देखो देश दो धरा नही नहीं ना नाम ने पड़ा पड़ी पर पल पानी पे प्यार फिर फिर भी बड़े बदन बन बना बस बात बार भारत भी भूख मन मर महान माँ मानव में में भी मेरे मैं मौत यह यहां यही या यूं ये रहा रही रही है रहे राम रोया है लगा लिए ले लोग वो शराब शहर संहार सब सा है शहर सारा से स्वार्थ हम हर हाथ ही हुआ हैं हो रहा होता

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