Jageera Ek Ajnabee Saudagar

Front Cover
Redgrab Books pvt ltd, Nov 3, 2021 - Fiction - 164 pages
चेतावनी: अगर आप कमजोर हृदय और इतिहास में छिपे सिर्फ सकारात्मक पहलुओं में विश्वाश रखते है तो यह अवश्य ही आपके लिए नहीं है "ठगमानुष" शृंखला का प्रथम खण्ड "जगीरा: एक अजनबी सौदागर", सन् 1850 के बाद ठगों के पुनरोदय और उनकी क्रूर यात्रा पर आधारित एक काल्पनिक उपन्यास है। कैसे ठगों का सरदार "जगीरा" और उसके साथी एक ठग यात्रा पर निकलते हैं, बेहद विपरीत परिस्थितियों में भी वे अपनी यात्रा जारी रखते हैं और लूटते हैं! जीवन सिर्फ सामाजिक बुराइयों से नहीं बल्कि मानविक बुराइयों से भी होकर गुजरता है। अगर कोई इंसान मानविक बुराइयों को अपनाकर, श्रद्धा और विश्वास के साथ स्वीकार करे कि दैवीय आशीर्वाद से यह उसका जन्मसिद्ध अधिकार है; तब वह सिर्फ अपराधी नही रह जाता, तब उसे ठगमानुष कहा जाता है। लगभग सन् 1800 के समय यही ठगमानुष खुलेआम शिकार करते थे, वे अपना हर शिकार देवी माँ भवानी को समर्पित करते थे। वे इतने क्रूर और पेशेवर होते थे कि लोग उनके नाम से थर्राते थे। ऐसा क्या था कि अंग्रेज भी उनसे खौफ खाते थे? इसलिए एक अलग विभाग बनाया जिसे बाद में इंटेलिजेंस ब्यूरो के नाम से जाना गया।शायद आप ऐसे अपराधी से बच सकते जो आपके सुरक्षा कवच को भेदना जानता हो परंतु अगर यह उसका पेशा है और वह इसे किसी भी कीमत पर करना जानता है तो आप कभी नहीं बच सकते।
 

Contents

Section 1
7
Section 2
11
Section 3
26
Section 4
41
Section 5
55
Section 6
83
Section 7
110
Section 8
133
Copyright

Common terms and phrases

अंग्रेज़ अगर अपना अपनी अपने अब अवश्य आगे आज इस उनके उन्हें उस उसका उसकी उसके उसने उसे एक ऐसा और कर रहे करता करते हुए करना करने का काम किया किसी की तरफ़ कुछ के बाद के लिए के साथ को कोई क्या ख़ान गया गयी गये गाँव घोड़े चाहिए जगीरा ने जब जा जाता जादूगर जो ठग ठगों ठीक तंबाकू तक तरह तलवार तुम तो था कि थी थीं दिया दी देख देखकर देखा दो दोनों नवाब नहीं निकल ने कहा पर परंतु पहले पहुँचा पास पीछे फिर बहुत भी मंगल ने मगर मन मुझे में मेरे मैं मैंने यह यहाँ रहा था रही रहे थे रास्ते लगा लिया लोग लोगों वह वहाँ विनायक ने वे शंकर शहर सकता सब सभी समय सरदार सामने साहब सिर्फ़ सूर्य से हम हमारे हमें हाँ हाथ ही हुआ हुई हुए कहा हूँ है हैं हो होकर होगा होता होने

About the author (2021)

लेखक सुभाष वर्मा द्वारा, "अधूरापन" के बाद "ठगमानुष" उनका दूसरा साहित्यिक उपन्यास है। पेशे से कैंसर विभाग में मेडिकल फिजिसिस्ट हैं। विज्ञान गल्प और क्राइम फिक्शन लिखना पसंद करते हैं। आधुनिक लेखन शैली के कारण, "आधुनिक साहित्यकार" के नाम से भी जाने जाते हैं।

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