श्री गुरूजी: दृष्टि और दर्शन

Front Cover
Suruchi Prakashan, Jan 1, 2007 - Philosophy - 360 pages
0 Reviews

संघ संस्थापक प॰पू॰ डॉ॰ हेडगेवार जी के देहावसान के पश्चात् 1940 में पूजनीय माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (श्री गुरूजी) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक बनेI प्रतिभासम्पन्न व्यक्तित्व, तेजस्वी व ऋषितुल्य  जीवन, निर्भय, अडिग, कुशल नेतृत्व, दूर-दृष्टि, सादगी, परिश्रम, आत्मीयता व संवेदनशीलता - श्रीगुरुजी इन गुणों से ओतप्रोत थेI लाखों स्वयंसेवकों के ह्रदय पर श्रीगुरुजी के स्नेही व प्रेरणादायक व्यक्तित्व ने अनूठी छाप छोड़ीI

विभिन्न विषयों पर श्रीगुरूजी की  सटीक व संतुलित दृष्टि थीI लगभग एक दशक पूर्व उनके विचारों, लेखों, भाषणों तथा संस्मरणों का संग्रह ‘श्रीगुरुजी समग्र ’ 12 खण्डों में प्रकाशित हुआI समग्र दर्शन में विभिन्न समसामयिक तथा राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर उनके विचार समाहित हैंI समय समय पर उठने वाले प्रश्नों तथा समस्याओं का समाधान भी इस समग्र का विषय हैI ‘श्रीगुरुजी समग्र ’ का संक्षिप्त दर्शन है - ‘श्रीगुरुजी - दृष्टि और दर्शन’  

 

What people are saying - Write a review

We haven't found any reviews in the usual places.

Selected pages

Common terms and phrases

अनुभव अनेक अपना अपनी अपने आज आदि आधार आवश्यक इन इस इस प्रकार इसलिए इसी ईश्वर उत्पन्न उनके उन्हें उन्होंने उस उसका उसकी उसके उसे एक एवं ऐसा और कर करते हैं करना करने के करें कहा का कार्य किंतु किया किसी की कुछ के कारण के रूप में के लिए के साथ केवल को कोई क्या खंड गया चाहिए जब जाता है जीवन के जो ज्ञान तक तथा तब तो था थे दिया दृष्टि देश द्वारा धर्म नहीं है नागपुर निर्माण ने पर परंतु पू प्रकार प्रकार के प्रत्येक प्राप्त बात भारत भी मन मनुष्य में मैं यदि यह यहाँ यही या रहा रहे राष्ट्र लोग लोगों वह विचार वे व्यक्ति शक्ति श्री श्रेष्ठ संपूर्ण सत्य सब सभी समय समाज समाज के सुख से स्वामी विवेकानंद हम हमारी हमारे हमें हिंदू ही हुआ हुए है और है कि हैं हो होगा होता है होती होते होना होने

Bibliographic information