Anunad: अनुनाद

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Book Bazooka, Nov 27, 2017 - 100 pages

 दुनियावी जटिलताओं को सुलझाने के लिए दौड़ते हुए जब एक पाँव के जूते का तस्मा खुलकर दूसरे पाँव के जूते में उलझ जाता है, तब जीवन के मायने तलाशने की आपाधापी शुरू हो जाती है। अँधेरी गलियों में कविताओं की लालटेन जब जलती है, उसकी रोशनी में तमाम वो चीजें आलोकित हो जाती है जो उपेक्षित और निर्वासित हो चली थी। साइकिल की घंटी चुटकी में तानपुरा बनकर गूँजने लगती है जिसका 'अनुनाद' पीढ़ियों तक मुखरित होता है। ऐसी ही लालटेन है सुमित गौतम का काव्य संग्रह 'अनुनाद'।

 

Contents

क्र०सं० कविता पेज नं० 1 शायद प्यार अमर हो जाये
8
चंदा की है आस मुझे भी
10
उल्लास न भारी पड़ जाये
12
नैतिकता से आगे
14
यह भी ठीक वह भी ठीक
15
आज हम यूँ कहीं
16
अभी जो आधा आधा है
18
ओ भैया इश्क़ बुरी बीमारी है
19
बीज
29
विस्तार
30
सौंप गए हो किन हाथों में
32
नन्हीं बिटिया
34
माँ ही रहना
38
शहर में जंगल
41
सोशल मीडिया
42
गीतिका
43

कबीरा का एकतारा
21
ऐ पथिक सुन लो
23
प्रेम कहाँ से लाओगे
25
परिंदे लौट आएंगे
27
क्रान्ति
28
कोई किताब नहीं हूँ मैं
45
तुमसे दूर नहीं जाऊँगा
47
कलम
48
एक लंबी रात की छोटी कहानी
52
Copyright

Common terms and phrases

अच्छा लगता है अपना अपनी अपने अब अभी भी बाकी आँख आँखों आगे आज आदमी की तरह आदमी को आदमी आधा आधे इस उस एक और कबीरा कभी कर कहाँ कहानी का की तरह जीने कुछ के को आदमी की कोई कौन क्या मिला उनको गया गयी गीत घर चाँद चाहिए छोड़ जब जरा जाऊँगा जाना जाने कब जिंदगी जीवन जो ठीक तक तब तरह जीने दो तुम तुमने तुमसे तुम्हारी तू तो था थी थे दिया दूर दे धर्म नई नही नहीं ना ने पर पल पाया पीछे प्यार प्रेम फिर बन बस बात भारत भारी पड़ जाये भी बाकी है भूल मन माँ मिला उनको जिन्होंने मीरा मुझको मुझे मुझे भी मुसलमान में मेरा मेरी मेरे मैं यह याद ये रंग रही रहे रात राम वह वही वो शहर शायद सब साथ सारी सी से हम हमको हर हिन्दू ही हुआ हूँ हूँ मैं हैं हो गये

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