जिन अभिषेक विधि Jin Abhishek Vidhi

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देवदर्शन की आवश्यकता एवं महत्त्व 

जैन धर्म में दर्शन का अर्थ श्रद्धान होता है अथवा श्रद्धा रूपी नेत्रों से वस्तु स्थिति को देखना / निहारना । देव दर्शन से अभिप्राय यही है कि भक्ति-भाव सहित श्रद्धा - आस्था - विश्वास को दर्शाते हुए सच्चे देव अर्थात् अरिहन्त परमेष्ठी की वन्दना करना। जैसी हम वस्तु देखते हैं, वैसे ही हमारे भाव बनते हैं। यदि हम अभद्र / गन्दे चित्र देखते हैं तो हमारे मन में विकार भाव / राग भाव आ जाते हैं। यदि जिनेन्द्र देव के अथवा साधु-सन्तों के दर्शन करते हैं तो हमारे मन में सद्भाव/वैराग्य के भाव या त्याग के भाव उत्पन्न हो जाते हैं। इसी प्रकार जिनेन्द्र देव के निर्मल गुणों को मन में जगाने हेतु जिनेन्द्र देव की वीतराग प्रतिमा के दर्शन करने से संसार और शरीर की वास्तविकता का ज्ञान होता है, इससे भाव शुद्ध होते हैं, पापों का क्षय होता है और पुण्य का बन्ध होता है ।


 

Common terms and phrases

ॐ ह्रीं अक्षत अथवा अनर्घ्य-पद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति अपने अभिषेक अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा अर्थात् आदि आरती इस ऋषिभ्यो नमः एक एवं ओर और कर करके करता करते हैं करने के करूँ करें किया की कुरु के लिए को क्षेपण गन्धोदक गया गुण चन्दन चावल चाहिए छन्द छिन्दि छिन्दि जय जल जाता है जाती जाप जिन जिनेन्द्र देव जी का अर्घ्य जीवन जैन जो णमो णमोकार तथा तीर्थंकर तुम तो दर्शन दीप द्रव्य धूप नमः नहीं निर्वपामीति श्री ने पढ़कर पद पर पाठ पुराण पुष्प पूजन पूजा पूर्व प्रकार प्रतिमा प्रभु प्राप्त फल भक्ति भगवान् भव भाव भावना भिन्दि-भिन्दि भी मंगल मन मन्त्र मन्दिर जी में मुख में मैं मोक्ष यह या ये लेकर वह विधि विराजमान विसर्जन शान्ति शिव शुद्ध सदा सभी समय समर्पित साथ सामग्री सिद्ध सुख से स्वस्ति हम हाथ ही हुए हूँ हेतु है और है कि हैं हो होता है होती होते होने ह्रीं श्री

About the author (2024)

श्रुताराधक सन्त

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