जिन अभिषेक विधि Jin Abhishek Vidhiदेवदर्शन की आवश्यकता एवं महत्त्व जैन धर्म में दर्शन का अर्थ श्रद्धान होता है अथवा श्रद्धा रूपी नेत्रों से वस्तु स्थिति को देखना / निहारना । देव दर्शन से अभिप्राय यही है कि भक्ति-भाव सहित श्रद्धा - आस्था - विश्वास को दर्शाते हुए सच्चे देव अर्थात् अरिहन्त परमेष्ठी की वन्दना करना। जैसी हम वस्तु देखते हैं, वैसे ही हमारे भाव बनते हैं। यदि हम अभद्र / गन्दे चित्र देखते हैं तो हमारे मन में विकार भाव / राग भाव आ जाते हैं। यदि जिनेन्द्र देव के अथवा साधु-सन्तों के दर्शन करते हैं तो हमारे मन में सद्भाव/वैराग्य के भाव या त्याग के भाव उत्पन्न हो जाते हैं। इसी प्रकार जिनेन्द्र देव के निर्मल गुणों को मन में जगाने हेतु जिनेन्द्र देव की वीतराग प्रतिमा के दर्शन करने से संसार और शरीर की वास्तविकता का ज्ञान होता है, इससे भाव शुद्ध होते हैं, पापों का क्षय होता है और पुण्य का बन्ध होता है । |


