Hamara Shahar Us Baras

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Rajkamal Prakashan, Sep 1, 2007 - Hindi fiction - 351 pages
आसान दीखनेवाली मुश्किल कृति हमारा शहर उस बरस में साक्षात्कार होता है एक कठिन समय की बहुआयामी और उलझाव पैदा करनेवाली डरावनी सच्चाईयों से ! बात ‘उस बरस’ की है, जब ‘हमारा शहर’ आए दिन सांप्रदायिक दंगों से ग्रस्त हो जाता था ! आगजनी, मारकाट और तद्जनित दहशत रोजमर्रा का जीवन बनकर एक भयावह सहजता पाते जा रहे थे ! कृत्रिम जीवन शैली का यों सहज होना शहरवासियों की मानसिकता, व्यक्तित्व, बल्कि पूरे वजूद पर चोट कर रहा था ! बात दरअसल उस बरस भर की नहीं है ! उस बरस को हम आज में भी घसीट लाये हैं ! न ही बात है सिर्फ हमारे शहर की ! ‘और शहरों जैसा ही है हमारा शहर’ – सुलगता, खदकता-‘स्रोत और प्रतिबिम्ब दोनों ही’ मौजूदा स्थिति का ! एक आततायी आपातस्थिति, जिसका हल फ़ौरन ढूंढना है; पर स्थिति समझ में आए, तब न निकले हल ! पुरानी धारणाए फिट बैठती नहीं, नई सूझती नहीं, वक्त है नहीं कि जब सूझें, तब उन्हें लागू करके जूझें स्थिति से ! न जाने क्या से क्या हो जाए तब तक ! वे संगीने जो दूर है उधर, उन पर मुड़ी, वे हम pa भी न मुद जाएँ, वह धुल-धुआं जो उधर भरा है, इधर भी न मुद आए ! अभी भी जो समझ रहे हैं कि दंगे उधर हैं-दूर, उस पार, उन लोगों में-पाते हैं कि ‘उधर’ ‘इधर’ बढ़ आया है, ‘वे’ लोग ‘हम’ लोग भी हैं, और इधर-उधर वे-हम करके खुद को झूठी तसल्ली नहीं दी जा सकती ! दंगे जहाँ हो रहे हैं, वहां खून बह रहा है ! सो, यहाँ भी बह रहा है, हमारी खाल के नीचे ! अपनी ही खाल के नीचे छिड़े दंगे से दरपेश होने की कोशिश हेई इस गाथा का मूल ! खुद को चीरफाड़ के लिए वैज्ञानिक की मेज पर धर देने जैसा ! अपने को नंगा करने का प्रयास ही अपने शहर को समझने, उसके प्रवाहों को मोड़ देने की एकमात्र शुरुआत हो सकती है ! यही शुरुआत एक जबरदस्त प्रयोग द्वारा गीतांजलिश्री ने हमारा शहर उस बरस में की है ! जान न पाने की बढती बेबसी के बीच जानने की तरफ ले जाते हुए !
 

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अधिक अपनी अपने अर्थ आदि इन इस प्रकार इसलिए इसी उन उनके उस उसका उसकी उसके उसमें उसी उसे एक ऐसा ऐसी ऐसे कर करके करता है करती करते करना करने कवि कविता कहते कहा का काल कालिदास काव्य किया किया है किसी की कुछ के कारण के लिए के साथ केवल को कोई क्या गया है गयी गये चाहिए चित्र छन्द जब जा सकता जाता है जाती जाते जिस जीवन जो तक तो था थी थे दिया दृष्टि दो दोनों द्वारा नहीं है नाटक नाम ने पर परन्तु प्रकट प्रकार के प्रयत्न फिर बहुत बात बाद भारतीय भाव भाषा मनुष्य में भी यदि यह या ये रस रहता रहा है रहे राजा रूप में वस्तु वह विषय वे शकुन्तला शब्द संस्कृत सकता है सकते सब समय साहित्य से हम ही हुआ हुई हुए है और है कि है जो है है हैं हो होता है होती होते होने

About the author (2007)

गीतांजलि श्री के चार उपन्यास – माई, हमारा शहर उस बरस, तिरोहित, खाली जगह – और पाँच कहानी संग्रह– अनुगूँज, वैराग्य, मार्च माँ और साकुरा, प्रतिनिधि कहानियाँ, यहाँ हाथी रहते थे छप चुके हैं। इनकी रचनाओं के अनुवाद अंग्रेज़ी, फ्रेंच, जर्मन, जापानी, सर्बियन, बांग्ला, गुजराती, उर्दू इत्यादि में हुए हैं। इनका एक शोध-ग्रंथ – बिट्वीन टू वर्ल्ड्स : एन इंटलैक्चुअल बिऑग्रैफ़ी ऑव प्रेमचन्द भी – प्रकाशित हुआ है। इनको इन्दु शर्मा कथा सम्मान, हिन्दी अकादमी साहित्यकार सम्मान और द्विजदेव सम्मान के अलावा जापान फाउंडेशन, चार्ल्स वॉलेस ट्रस्ट, भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और नॉन्त स्थित उच्च अध्ययन संस्थान की फ़ैलोशिप मिली हैं। ये स्कॉटलैंड, स्विट्ज़रलैंड और फ्रांस में राइटर इन रैजि़डैंस भी रही हैं। गीतांजलि थियेटर के लिए भी लिखती हैं और इनके द्वारा किए गए रूपांतरणों का मंचन देश-विदेश में हुआ है। सम्पर्क : वाई ए-3, सहविकास, 68 आई पी विस्तार, दिल्ली-110 092

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