Hindi Bhasha : Vikas Aur Swaroop

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Prabhat Prakashan, Jan 1, 2009 - 239 pages
हिंदी के ऐतिहासिक संदर्भ में जहाँ अपभ्रंश, अवहट्ट और पुरानी हिंदी महत्त्व है वहीं उसके स्वरूप-निर्धारण में उसकी उपभाषाओं-बोलियों का, विशेष रूप से ब्रजभाषा और अवधी का, अप्रतिम महत्त्व है। हिंदी की प्रमुख बोलियों और उनके पारस्परिक संबंध पर भी विवेचन प्रस्तुत किया गया है। हिंदी भाषा के मानकीकरण की समस्या भी है। प्रयोग क्षेत्र में हिंदी की कोई समानता नहीं है, जिसको हिंदी क्रियाओं के विविध प्रयोगों को लेकर प्रस्तुत किया गया है। इससे दो प्रयोगों में सूक्ष्म अंतर स्पष्ट हो सकेगा। शुद्ध हिंदी लिखने के लिए हिंदी व्याकरण के प्रमुख नियमों का ज्ञान भी आवश्यक है। अपनी अभिव्यक्ति का रंग-रूप निखारने के लिए व्याकरणसम्मत भाषा का प्रयोग अच्छा रहता है।

पुस्तक की विषय-वस्तु बहुत सरल तथा सहज भाषा में प्रस्तुत की गई है, जिससे हिंदी भाषा के जिज्ञासु उससे अधिकाधिक लाभान्वित हो सकें।

 

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Contents

Section 1
Section 2
Section 3
Section 4
Section 5
Section 6
Section 7
Section 8
Section 11
Section 12
Section 13
Section 14
Section 15
Section 16
Section 17
Section 18

Section 9
Section 10
Section 19
Section 20

Common terms and phrases

अंग्रेजी अंग्रेजी भाषा अधिक अनुवाद अनेक अन्य अपनी अपने अपयश अब अवधी आदि इन इम इलाहाबाद इस इसके ईई ईत् उगे उनके उन्होंने उस एक और कबीर कर करते कहा का का प्रयोग किए किया किया गया किया है किसी की कुछ के रूप में के लिए को को भाषा क्षेत्र गई गए गया है गुजरात चाहिए चोली जब जाए जाता है जो तक तथा तो था थी थे दिया दिल्ली दृष्टि देवनागरी देवनागरी लिपि द्वारा नहीं नागरी नाम ने पंजाबी पकी पर प्रकार प्राप्त ब्रजभाषा भाया भाया के भारत भारतीय भाषाओं भी मन माध्यम मानक में भी यर यल यह या रचना रहा रही रहे राजभाषा राज्य राष्ट्रभाषा लिखा लिपि वन वह विकसित विकास विचार शब्द शब्दों से स्वरूप हिंदी हिदी हिदी के हिल ही हुआ हुई हुए है और है कि है है हैं हो होता है होती होते

About the author (2009)

कैलाशचंद्र भाटिया भाषा विज्ञान तथा हिंदी भाषा के विविध पक्षों पर अनुसंधान के साथ-साथ साहित्य की नवीन विधाओं की ओर प्रवृत्त। ‘मदन मोहन मालवीय पुरस्कार’, ‘अयोध्याप्रसाद खत्री पुरस्कार’, ‘नातालि पुरस्कार’, ‘सुब्रह्मण्यम भारतीय पुरस्कार’ आदि से सम्मानित। भूतपूर्व प्रोफेसर तथा अध्यक्ष, हिंदी तथा प्रादेशिक भाषाएँ, लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी पूर्व निदेशक, वृंदावन शोध संस्थान, वृंदावन। भारत सरकार के अनेक मंत्रालयों की राजभाषा सलाहकार समितियों के सदस्य। रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ इंग्लैंड के फेलो। प्रमुख रचनाएँ : ‘अंग्रेजी-हिंदी अभिव्यक्ति कोश’, ‘अंग्रेजी-हिंदी अभिव्यक्ति कोश’, ‘अंग्रेजी-हिंदी शब्दों का ठीक प्रयोग’, ‘भारतीय भाषाएँ’, ‘शब्दश्री’, ‘अखिल भारतीय प्रशासनिक कोश’, ‘अनुवाद कला : सिद्धांत और प्रयोग’, ‘कामकाजी हिंदी’, ‘व्यावहारिक हिंदी’, ‘विधा-विविधा’, ‘भाषा-भूगोल’, ‘हिंदी भाषा शिक्षण’, ‘हिंदी की बेसिक शब्दावली’, ‘हिंदी काव्य भाषा की प्रवृत्तियाँ’, ‘रोडाकृत राउलवेल’, ‘हिंदी साहित्य की नवीन विधाएँ’, ‘उभरी गहरी रेखाएँ’ (सं.) ‘हिंदी भाषा में अक्षर तथा शब्द की सीमा’, ‘ब्रजभाषा तथा खड़ीबोली का तुलनात्मक अध्ययन’, ‘हिंदी साहित्य का वृहद् इतिहास : अद्यतन काल’ (सं.), ‘हिंदी भाषा : विकास और स्वरूप’, ‘राजभाषा हिंदी’ तथा ‘हिंदी की मानक वर्तनी’ तथा ‘हिंदी शब्द सामर्थ्य’। मोतीलाल चतुर्वेदी शिक्षा : एम.ए. (हिंदी एवं अंग्रेजी), पी-एच.डी.। अग्रवाल कॉलेज एवं किशोरी रमण कॉलेज, मथुरा में अध्यापन; व्याख्या तथा सहायक निदेशक, हिंदी शिक्षण योजना, गृह मंत्रालय, भारत सरकार के पद से सेवामुक्त। प्रमुख रचनाएँ : ‘आपकी हिंदी’, ‘हिंदी : यादों की दूरबीन से’, ‘रेलवे प्रशासन में प्रयुक्त प्रशासनिक शब्दावली का व्याकरणिक एवं शब्दकोशीय अध्ययन’। संप्रति : वैदिक और उपनिषदीय अध्ययन एवं लेखन में संलग्न।

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