Sankshepan Aur Pallavan

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Prabhat Prakashan, Jan 1, 1997 - Abstracting - 195 pages
सूचना विस्फोट के इस दौर में अधिक- से- अधिक सूचनाओं को हथियाने की जबरदस्त होड़ लगी है । इन सूचनाओं को बटोरकर रखने के इस प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिकी युग में कई साधन उपलब्ध हैं । एक ओर तो अधिकाधिक सूचनाओं प्राप्त करने की लालसा बलवती हो है और दूसरी ओर मानव की व्यस्तता में दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ोतरी हो रही । इसका निराकरण कैसे हो? संक्षेपण कला के विकास का उत्स यही है । हमारे यहाँ ' गागर में सागर ' भरने की प्रवृत्ति पहले से ही विद्यमान है । अत: इस ओर ध्यान जाना स्वाभाविक है ।

सूत्र रूप में लिखी या कही गई बात के गर्भ में भाव और विचारों का एक पुंज छिपा होता है । विद्वान् जन एक पंक्ति पर घंटों बोल लेते हैं और कई बार तो एक पूरी पुस्तक ही रच डालते हैं । यही कला ' पल्लवन ' कहलाती है ।

इस पुस्तक में इन दोनों पक्षों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है । आदर्श नमूने भी दिए गए हैं और अभ्यास के लिए पर्याप्त अवतरण तथा सूक्तियाँ भी । यह पुस्तक केवल विद्यालयों और विश्व- विद्यालयों के छात्रों का हित ही नहीं करेगी, बल्कि प्रशासन से जुड़े अधिकारियों, कर्मियों, विभिन्न स्तर के अध्यापकों और राज्य सरकारों, केंद्र सरकार या अन्य संगठनों द्वारा आयोजित की जानेवाली विविध प्रतियोगिता परीक्षाओं की दृष्टि से भी इस पुस्तक का अप्रतिम महत्त्व है ।

 

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विजय भगत

Contents

Section 1
7
Section 2
11
Section 3
59
Section 4
63
Section 5
70
Section 6
97
Section 7
122
Section 8
125
Section 9
151
Section 10
159
Section 11
164
Section 12
176
Section 13
182
Section 14
197

Common terms and phrases

अधिक अपना अपनी अपने अब आज आदि आवश्यक इन इम इस इसी उगे उनके उसका उसके उसे एक एवं ऐसा ऐसे कम कर करता है करते हैं करना करने का किया किसी की कुछ के लिए केवल को कोई गई गए गया है चाहिए जगे जब जा जाए जात जाता है जाती जाते हैं जान जिसमें जीवन जो तक तथा तरह तो था थी थे दर्शन दिया देश दो द्वारा धर्म न को नहीं है ने पकता है पकते पका पकी पर पवई पु प्रकार प्राप्त फिर बन बना बने बहुत भाया भारत भारतीय भाषा भी मन मनुष्य ममय मानव मैं यदि यमन यर यल यह या रहा है रहे रा राष्ट्र रूप में लेकिन वन वने वल वह विचार विशेष विषय वे व्यक्ति शब्द शब्दों शिक्षा संक्षेपण से हम ही हुआ हुए है और है कि हैं हो होगा होता है होती होते होना होने

About the author (1997)

कैलाशचंद्र भाटिया भाषा विज्ञान तथा हिंदी भाषा के विविध पक्षों पर अनुसंधान के साथ-साथ साहित्य की नवीन विधाओं की ओर प्रवृत्त । मदन मोहन मालवीय पुरस्कार, अयोध्याप्रसाद खत्री पुरस्कार, नातालि पुरस्कार, सुब्रह्मण्यम भारती पुरस्कार आदि से सम्मानित । भूतपूर्व प्रोफेसर तथा अध्यक्ष, हिंदी तथा प्रादेशिक भाषाएँ, लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी । पूर्व निदेशक, वृंदावन शोध संस्थान, वृंदावन । भारत सरकार के अनेक मंत्रालयों की राजभाषा सलाहकार समितियों के सदस्य । रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ इंग्लैंड के फेलो । प्रमुख रचनाएँ : अंग्रेजी-हिंदी अभिव्यक्ति कोश, अंग्रेजी-हिंदी शब्दों का ठीक प्रयोग, अखिल भारतीय प्रशासनिक कोश, हिंदी काव्य भाषा की प्रवृत्तियाँ हिंदी साहित्य की नवीन विधाएँ, हिंदी भाषा में अक्षर तथा शब्द की सीमा, हिंदी साहित्य का वृहद् इतिहास : अद्यतन काल (सं.), हिंदी भाषा स्वरूप और विकास, राजभाषा हिंदी, हिंदी की मानक वर्तनी । तुमन सिंह देहरादून जनपद में जनमे तुमन सिंह की प्रारंभिक शिक्षा गाँव के स्कूल में ही हुई । आगरा विश्वविद्यालय से बी.ए. तथा जी.सी.पी. आई., इलाहाबाद से 1968 में एल.टी. का पाठ्यक्रम पूरा किया । हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिंदी) और डी.फिल्. की उपाधियाँ प्राप्त कीं । डी.फिल्. के शोधप्रबंध-' कार्यालयीन अनुवाद : स्वरूप और विश्लेषण ' पर आपको भारतीय अनुवाद परिषद् का ' नातालि ' पुरस्कार प्राप्त हुआ । हिंदी भाषा से संबंधित विविध विषयों पर आपकी बारह पुस्तकें और अनेक आलेख, समीक्षाएँ, शोध-लेख आदि प्रकाशित हो चुके हैं । सप्रति : भाषा संकाय, लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी (उप्र.) में 1980 से अध्यापनरत ।

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