अधूरे हम तुम: Adhure Ham Tum

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Book Bazooka Publication, Aug 9, 2019 - Poetry - 145 pages

एक निश्छल मन जब दूसरे प्रांजल और सुकोमल मन पर आकृष्ट होता है और होता ही जाता है तब उन दोनों मनों के दरम्यान जो भावसरिता प्रवाहित हो रही होती है, कदाचित उसी का नाम प्रेम है।यह एक मनःस्थिति ही है, जब कोई प्रेम में होता है तो उसकी संवेदना समय के पार जाकर हमेशा जागृत रहती है ।   

अधूरे हम तुम की कविताएं इसी वक़्फे में एक ऐसे ही प्रेमी के कोमल बयान हैं जिनमें अभिव्यक्ति के अधिकतम आयाम देखें जा सकते हैं।विमल चन्द्राकर के भीतर का कवि इन कविताओं में चेतन और अचेतन मन के साथ अपने प्रेमपात्र से अनवरत अंतरंग संवाद में लीन है।यह स्थिति संसार की सबसे अच्छी होती है। दरअसल यह प्रेम का चरम है कि हर संवाद कवि को इतना सुंदरतम लगता है कि कविता हो जाती है।यह प्रतीति ही प्रीति की वृहद परास रचती है, तभी वह बेचैन खगवृंद के समान जागता है, देह व्याकुल चातक समान होकर एक दृष्टि की बूंद से तृष्णा बुझाने के लिए आकुल रहने लगती है। मेघों का हर विचलन प्रेमराग हो जाता है, मिलन का स्थान दरगाह ए इश्क हो जाता है। प्रेम पात्र में वह काशी और काबा की स्थापना करते हुए नेह की डोर से संबद्ध होकर उसके हर गुण पर निसार हो जाता है।वह कभी अपने इस विशिष्ट भाव को नश्वर मानता है तो कभी एक पक्षी की तरह जमाने की प्रकृति से डर कर समय की परिधि पर देखते हुए चौंकता भी है।

विमल चन्द्राकर की कविताएं समग्र रूप से दरअसल एक प्रेमिल मन का आख्यान कही जा सकती हैं।इनमें प्रत्येक कोण से एक प्रेमी अपनी भावनाओं को शब्दों में ढाल रहा है। पुलकित, उल्लसित, द्रवित और आह्लादित कवि हृदय जब कुछ भी अनकहा नहीं छोड़ता तब उसे ऐसी ही विशिष्ट कविताएं कहकर अपनी हिस्से का कहन पूरा करना होता है, जिसे पढ़कर ऐसे ही प्रेम भरे हृदय जरूर यह पाएंगे कि विमल चन्द्राकर ने उनके हिस्से का भी कदाचित सब कुछ इन कविताओं में कह दिया है, और वह भी अर्थपूर्ण और भावपूर्ण ढंग से।

सरल, सहज और संप्रेषित होने वाली भाषा में बुनी गई यह कविताएं पाठकों को जरूर पसन्द आएंगीं।

- ब्रज श्रीवास्तव

 

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Contents

Section 1
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Section 2
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Section 3
17
Section 4
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Section 5
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Section 6
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Section 7
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Section 8
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Section 10
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Section 11
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Section 12
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Section 13
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Section 14
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Section 15
110
Section 16
113
Section 17
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Section 9
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Common terms and phrases

अधूरे हम तुम अपनी अपने अब आँखों में आईना आज भी आयी हो इतना इन इस उत्तर प्रदेश उस एक और कभी कम कर करता करती करते करने कवि कविता कविताओं कहाँ कहीं का कानपुर काव्य काशी कि किसी कुछ के साथ को क्या गंगाजल गया गयी जब जा जाता है जीवन जो तक तुमने लिखा तुम्हारे तू तू मेरी तो था थी दर्द दिन दिल देखा है देह द्वारा न जाने नज़र नहीं निस्पृह प्रेम ने नोट पढ़ पर पहले प्रकाशित प्रिय प्रेम की फिर बन बना बात बार भर भाव भी मन मुझे में में तू में भी मेरा मेरी मेरे मैं मौन यह यहाँ याद ये रंग रहा रही रहे राग रात रिश्ते लगा लिखी वह विमल विश्वास वो संग सदा के लिए सब सबसे समय सा साहित्यिक सी सुनो से सेक्सोफोन हमने हर ही हुआ हुए हूँ हृदय है और है कि हैं होता है

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