Hindī upanyāsa: sr̥jana aura siddhānta

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Vāṇī Prakāśana, 1989 - Hindi fiction - 295 pages
Style and literary principles of Hindi novelists, 1882-1965; a study.

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प्रशकाल
प्रेमारकाल
बो देवराज र र

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अज्ञेय अत अथवा अधिक अन्य अपनी अपने इन इलाहाबाद इस इस प्रकार इसी ई० उद्देश्य उनका उनकी उनके उन्होंने उपन्यास उपन्यास के उपन्यासकार उपन्यासों उस उसका उसकी उसके उसे एक एवं ऐतिहासिक ओर कर करता है करते हैं करना करने कल्पना कला कहानी का काव्य किन्तु किसी की की है कुछ के रूप में के लिए के साथ केवल को कोई चाहिए जाता है जैनेन्द्र जो तक तत्वों तथा तो था द्वारा दिया दृष्टि दो दोनों नहीं है ने पर प्रतिभा प्रयोजन प्रस्तुत प्रेमचन्द पाठक पृ पृ० बहुत भी मनोरंजन मात्र मैं मोहन राकेश यथार्थ यदि यह या युग रचना रूप से लेखक वह वही व्यक्ति विचार वे सकता है सकती सत्य समय सम्बन्ध समाज संस्करण स्पष्ट स्वरूप स्वीकार स्वीकार किया है सामाजिक साहित्य के साहित्यकार से ही हुए है और है कि है है हैं हो सकता होगा होता है होती होते होना होने

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