Rajshekhar

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Vāṇī Prakāśana, 1994 - 208 pages
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Novel based on the life and achievements of Rājaśekhara, ca. 880-ca. 920, Sanskrit poet.

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अतः अत्यंत अनुभव अनेक अन्य अपना अपनी अपने अब अभिनय अवन्ति अवन्तिका ने अवन्तिसुन्दरी ने अवस्थित आ गये आज आरंभ इन इस उज्जयिनी उनका उनकी उनके उन्हें उन्होंने उस उसकी उसके उसने उसे एक ऐसा कक्ष कर दिया करते हुए करना करने करने के कला कहा का किन्तु किया किया और किसी की ओर कुछ के उपरान्त के लिए के साथ को कोई गया था गये ग्राम चल चले जब जा जाने तक तथा तब तो था और था कि थी और थीं दिवस दी देखा दोनों द्वारा नरेश नहीं नाटक नाट्य नृत्य पड़े पर प्राप्त फिर बहुत भाव भी मधुकेतकी माँ मुख में में ही मैं यह यहाँ यात्रा ये रही थी राजशेखर और राजशेखर ने राजा रात्रि रूप लगा लगी लगे लिया वह वहाँ विचार वे सभी समय से स्वयं ही हुआ हुई है और हैं हो गई हो गया हो रहा था होकर होता होते होने

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