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Ravīndra Jādhava, Keśava More
Vani Prakashan, 2016 - Hindi language - 369 pages
समाज की किसी भी विचारधारा,आंदोलन एवं परिवर्तन का जन्म परिवेश और परिथिति की कोख से ही होता है। साहित्य भी उसी सामाजिक परिवेश और परिस्थिति की महत्तम उपलब्धि है।, मीडिया और हिन्दी’ इसी बदलती विचारधारा का एक महत्व्व्पुर्ण पहलू है। बजरबाद के इस युग में मीडिया और भाषा का परिवर्तित स्वर एवं स्वरूप संवेदनशील मानव समाज के लिए चिंता का विषय बन गया है। उसी चिंता को चिंतन का विषय बना कर इस पुस्तक में उतारा गया है।
 

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