Jansampark Prabandhan

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Prabhat Prakashan, Jan 1, 2009
आज के भूमंडलीय समय में जनसंपर्क मात्र प्रचार-प्रसार की प्रविधि ही नहीं रह गया है बल्कि उच्च प्रौद्योगिकी के युग में जनसंपर्क के निरंतर विस्तृत होते क्षेत्र और उसकी बहुआयामी प्रकृति ने जनसंपर्क को एक विधा, व्यवस्था, कला आदि रूपों में प्रतिष्ठा दिलाई है। जनसंपर्क आज प्रबंधकीय कार्य से जुड़ गया है। शासकीय, प्रशासनिक और औद्योगिक संगठन सभी इस तथ्य को बखूबी समझ रहे हैं कि व्यावसायिक, औद्योगिक शैक्षिक, राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक सभी क्षेत्रों में उनकी प्रतिष्ठा एवं पहचान जनसंपर्क के बिना संभव नहीं है। संगठन के उद्देश्यों की सफलता जनसंपर्क कार्यक्रमों पर ही निर्भर है। आज लगभग सभी संस्थाएँ और संगठन अपने वांछित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जन- समुदाय से अनुकूल सामंजस्य स्थापित करने के लिए जनमत-निर्माण की दिशा में सफलता प्राप्त करने के लिए जनसंपर्क का सहारा ले रहे हैं। अनेकानेक स्तरों पर जनसंपर्क की बढ़ती आवश्यकता को स्वीकार करने के कारण आज विभिन्न देशों में जनसंपर्क संस्थान स्थापित हो रहे हैं। समय के बदलाव के साथ जनसंपर्क की अवधारणा और उसकी प्रकृति में भी बदलाव आ रहा है। प्रस्तुत पुस्तक जनसंपर्क के स्वरूप, उसके बदलते आयामों और उसके सिद्धांतों को विश्लेषित करती है।
 

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Contents

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Section 8
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Section 9
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Common terms and phrases

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