Dhann Narbada Maiya Ho

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Rajkamal Prakashan, Sep 1, 2008 - 576 pages
‘धन्न नरबदा मइया हो’ पुस्तक में प्रभाष जोशी के ज्यादातर लेख व्यक्तिगत हैं। हालाँकि इस संकलन में परम्परा और संस्कृति, यात्राओं तथा पर्यावरण से सम्बन्धित आलेख भी संकलित हैं, लेकिन इन सबका रुझान व्यक्तिगत ही है। प्रभाष जोशी अपनी भूमिका में लिखते हैं: ‘‘इस पुस्तक का शीर्षक - धन्न नरबदा मइया हो - दरअसल अपनी किशोर वय में जबलपुर के एक गीतकार से एक कवि सम्मेलन में सुने मछुआरों के एक गीत से लिया है। हैया हो हो हैया हो, धन्न नरबदा मइया हो। पहले का दिया शीर्षक था - बार-बार लौटकर जाता हूँ नर्मदा। इस शीर्षक की आत्मा को ज्यों का त्यों रखते हुए इन निबन्धों को पढ़ने के बाद मैंने शीर्षक धन्न नरबदा मइया हो कर दिया। ये निबन्ध खड़ी बोली के औपचारिक गद्य में नहीं लिखे गए हैं। इनमें बोली की अनगढ़ता लेकिन अनुभूति की सघनता, आत्मीयता और भावुकता है। ये मेरी कोठरी के भीतर की कोठरी की ऐसी खिड़की है जो घर के आँगन और उस पर छाए आकाश में खुलती है। ये निहायत निजी कहे जानेवाले निबन्ध हैं लेकिन ऐसी निजता के जो बाहर के ब्रह्मांड से तदाकार हो गई है। सच, इनमें निजी कुछ नहीं है। हजारीप्रसाद द्विवेदी और कुबेरनाथ राय को पढ़ते हुए मैंने जो अपना मालव मानव-संसार बनाया है, ये निबन्ध उनमें आपको बुलाने के बुलव्वे हैं। इनमें पर्यावरण और संस्कृति के मेरे सरोकार हैं और कुछ यात्रा विवरण हैं, जो यात्रा वृत्तान्त की तरह नहीं अपनी अन्तर्यात्रा में अपनी तलाश के किस्से हैं।’’

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About the author (2008)

प्रभाष जोशी 15 जुलाई, 1937 को मध्यप्रदेश में सिहोर जिले के आष्टा गाँव में पैदा हुए। शिक्षा इंदौर के महाराजा शिवा जी राव मिडिल स्कूल और हाई स्कूल में हुई। होल्कर कॉलेज, गुजराती कॉलेज और क्रिश्चियन कॉलेज में पहले गणित और विज्ञान पढ़े। देवास के सुनवानी महाकाल में ग्राम सेवा और अध्यापन किया। पत्रकारिता को समाज परिवर्तन का माध्यम मानकर सन् 60 में ‘नई दुनिया’ में काम शुरू किया। राजेन्द्र माथुर, शरद जोशी और राहुल बारपुते के साथ काम किया। यहीं विनोबा की पहली नगर यात्रा की रिपोर्टिंग की। 1966 में शरद जोशी के साथ भोपाल से दैनिक ‘मध्यप्रदेश’ निकाला। 1968 में दिल्ली आकर राष्ट्रीय गांधी समिति में प्रकाशन की जिम्मेदारी ली। 1972 में चम्बल और बुंदेलखंड के डाकुओं के समर्पण के लिए जयप्रकाश नारायण के साथ काम किया। अहिंसा के इस प्रयोग पर अनुपम मिश्र और श्रवण कुमार गर्ग के साथ पुस्तक लिखी - चम्बल की बन्दूकें, गांधी के चरणों में। 1974 में ‘प्रजानीति’ (साप्ताहिक) और ‘आस पास’ निकाली जो इमरजेंसी में बन्द हो गई। जनवरी ’78 से अप्रैल 81 तक चंडीगढ़ में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ का सम्पादन किया। फिर ‘इंडियन एक्सप्रेस’ (दिल्ली संस्करण) के दो साल तक सम्पादक रहे। सन् 83 में प्रभाष जोशी के सम्पादन में ‘जनसत्ता’ का प्रकाशन हुआ। प्रभाष जोशी की पुस्तक मसि कागद और हिन्दू होने का धर्म भी है। 5 नवम्बर, 2009 को दिल्ली में निधन हुआ।

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