Pārada tantra vij˝āna

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Motilal Banarsidass Publishe, 2006 - Medicine, Ayurvedic - 190 pages
This book is the first consistent theological treatment of the subject of Hindu thought known to itself as Trika or Triadiam and popularly as Kashmir Saivism. Few Indic theologies equal it in architectonic power and mystical profundity. Its highest category and goal is consciousness or Light whose foremost characteristic is Freedom. This goal can be attained through four ways (upayas). The theology of these ways pertains to Gnostic or knowledge oriented Triadism whose prime theologian is Ahhinavagupta the emperor of Indic speculation.
 

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Very nice book

Contents

Section 1
15
Section 2
21
Section 3
38
Section 4
48
Section 5
55
Section 6
57
Section 7
61
Section 8
73
Section 10
126
Section 11
142
Section 12
151
Section 13
163
Section 14
171
Section 15
179
Section 16
180
Section 17
184

Section 9
87
Section 18
195

Common terms and phrases

अग्नि अत अति अथक अथति अथवा अनेक अन्य अपने अर्थात आदि आयुर्वेद इन इस उत्तम उपर उस उसे एक एवं और कर करता है करते करना करने करने है कहा है का कि किया की के रस के रूप में के लिये के साथ को क्रिया क्रियाओं गन्धक गया है गारद गुण चाहिए जगे जब जल जा जाण जाता है जाती जान जाया जो तक तथा तब ताम तीन तो था दिन दृष्टि देने देवे देह दो दोष द्वारा नहीं नाम नाश निरूपण नीचे ने पर पल पवार पारद के पारद में प्रकार प्राप्त फल फिर बद्ध बने बल भक्षण भस्म भाग भी भेद मिट्टी में पारद यथा यन्त्र यम यमन यया यर यल यह ये रख रम रस रोग लेकर लेवे वन वने वह विधि वेध शिव शुद्ध सिद्ध से स्वर्ण ही हुआ हुए है और हैं हो जाता है होकर होता है होती होने

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