भारतीय तर्कशास्त्र (INDIAN LOGIC)

Front Cover
PHI Learning Pvt. Ltd., Oct 1, 2012 - Philosophy - 160 pages
0 Reviews
इस पुस्तक में भारतीय तर्कशास्त्र के सिद्धांतों का विश्लेषणात्मक तथा तुलनात्मक अध्ययन सोदाहरण प्रस्तुत किया गया है | इसमें न्याय, बौद्ध, जैन तथा वेदांत तर्कशास्त्रों की समानताओं तथा विभिन्नताओं का स्पष्ट उल्लेख किया गया है साथ ही नव्य न्याय, सांख्य, योग, वैशेषिक तथा मीमांसा तर्कशास्त्रों के महत्तव पर भी प्रकाश डाला गया है | इनके अलावा, इसमें भारतीय तथा पाश्चात्य तर्कशास्त्रों के सिद्धांतों में अंतर भी दिया गया है |

इसमें भारतीय परंपरा में तत्त्वमीमांसा, प्रमाणमीमांसा एवं तर्कशास्त्र के संबंधों की व्याख्या की गयी है तथा अनुमान की परिभाषा,अवयव, प्रक्रिया, आधार एवं भेद भी दिए गए हैं | भारतीय तर्कशास्त्र में निहित आगमनात्मक तत्त्वों और हेत्वाभासों का भी वर्णन इस पुस्तक में है |

यह पुस्तक दर्शनशास्त्र के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के अनुरूप लिखी गई है, जिसमें भारतीय तर्कशास्त्र एक पेपर के रूप में सम्मिलित है | इससे हिंदी भाषी राज्यों विशेषकर बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश के विश्वविद्यालयों के विद्यार्थी लाभान्वित होंगे | इसके अलावा, यह संघ तथा राज्य लोक सेवा आयोगों की प्रतियोगी परीक्षाओं मे हिंदी माध्यम से सम्मिलित हो रहे अभ्यार्थीयों के लिए भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी |
 

What people are saying - Write a review

We haven't found any reviews in the usual places.

Contents

Indian Logic01pdf
1
Indian Logic02pdf
8
Indian Logic03pdf
17
Indian Logic04pdf
37
Indian Logic05pdf
62
Indian Logic06pdf
93
Indian Logic07pdf
98
Indian Logic08pdf
115
Indian LogicApndxpdf
137
Indian LogicIndexpdf
149

Other editions - View all

Common terms and phrases

अत अतएव अनित्य अनुमान की अनुमिति अन्वय अर्थात् आदि इच्छा इन इस इसलिए उत्पन्न उदाहरण उन्हें उस एक एव ओंर ओर और का अभाव का अर्थ का ज्ञान काने किया जाता है किसी के अनुसार के आधार पर के लिए को क्या है क्याण क्योकि जा सक्ला है जाए जाग जाता है जाती जिया जिस जैन झा तथा तरह तर्कशास्त्र तर्कशास्त्र में तीन तो दी दो दोनो द्वारा धर्म धुनों नहीं है नहीं होता है निगमन निश्चित ने ने भी पक्ष में पद परतु परिभाषा पर्वत पस्तु पृ प्रतिज्ञा प्रन्यक्ष प्रयोग फ्ला बोद्ध भारतीय भी मात्र माना में हेतु यदि यह यहा या रहता है रा रूप में रो वल्हा वह वाचस्पति मिश्र वाले विपक्ष विष्य व्यक्ति व्याप्ति शब्द शब्दों सवध साध्य का सिद्ध से स्पष्ट स्वीकारा ही हुए हे हेतु का हेत्वाभास है और है कि है जो हैं हो सक्ला होता है होती होते होना

About the author (2012)

एन. पी. तिवारी, प्रोफेसर, दर्शनशास्त्र विभाग, पटना विश्वविद्यालय, पटना | प्रोफेसर तिवारी विगत 30 वर्षों से दर्शनशास्त्र के अध्यापन तथा शोध में लगे हुए हैं |

Bibliographic information