लघुत्रयी में चरित्र-विधान का समीक्षात्मक अध्ययन

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कालिदास सुकुमार शैली के प्रख्यात कवि हैं। इनकी कृतियों का मूल्यांकन भारत ही नहीं, भारत के बाहर भी होता रहा है। इनकी तीन कृतियांँ ‘‘लघुत्रयी’’ के नाम से संस्कृत जगत् में विख्यात है। रघुवंशम् एवं कुमार-संभवम् दो महाकाव्य तथा मेघदूतम् खण्ड काव्य। इन तीनों का समवेत् रूप कुछ विशिष्टताओं से अलंकृत हैं। एक शैली में रचित एक ही कवि की तीन रचनाएँ साहित्यिक वैशिष्ट्य के अतिरिक्त कवि की प्रतिभा का अमूल्य निदर्शक है। अगर यह कहा जाय कि काव्य शास्त्रियों ने काव्यांग-स्थिरीकरण में कालिदास की इन कृतियों को हीं आधार बनाया है, तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। 

कालिदास के काव्यों पर अब तक शोध-कार्य बहुत अधिक हो चुके है, फिर भी इनके काव्यों के अनेक पक्ष अभी भी शोध-कार्य की अपेक्षा रखते हैं। विविध पक्षों को उद्भाषित करनेवाले शोध-कार्यों का परिगणन उपयुक्त नहीं। संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध एवं विख्यात कवि कालिदास के समय, जन्म आदि से सम्बंध में यदपि अनेक शोध-प्रबंध एवं शोध-पत्र लिखे गये है, फिर भी अंतिम रूप में इन तथ्यों को प्रमाणित करना संगत नहीं हो सका है। कालिदास पर अब तक किये गये कार्यो में इनके ग्रन्थों का साहित्यिक पक्ष काव्यशास्त्रीय विवेचन, सांस्कृतिक-परिशीलन, शब्द-योजना, नामाख्यात्, उपसर्ग-निपात से संबंधित कार्य, प्रकृति-चित्रण एवं अन्यान्य विषयों से संबंध भी कार्य निष्पादित हो चुके है।

साहित्य के विद्यार्थी होने के चलते कालिदास मेरे प्रिय कवि रहे हैं। कालिदास के ग्रंथो का विशेष रूप में अध्ययन मेरा प्रधान विषय रहा है। कालिदास के ग्रन्थों के अध्ययन के बाद जब इन पर किये गये शोध कार्योें का अन्वेषण मैंने किया, तो देखा कि ‘‘लघुत्रयी‘‘ चरित्र विषयक संकल्पना का समीक्षण अभी तक अछूता है। विभिन्न टीकाओं में एवं विभिन्न ग्रन्थों की भूमिका में इनके काव्यों के चरित्र विषयक संकल्पना की ओर संकेत अवश्य किया गया है। ‘‘लघुत्रयी’’ में परिगणित तीनों ही ग्रन्थों के चरित्र विषयक संकल्पना की समीक्षा नहीं होने से कालिदास के साहित्य का यह पक्ष अनालोचित एवं असमीक्षित था, यही कारण है, कि मैंने अपने शोध-प्रबंध का विषय इसे ही चुना। 

प्रस्तुत शोध-कार्य कालिदास के साहित्य का अनोलोचित पक्ष है, जिसकी समीक्षा की गयी है। मैंने इस शोध-प्रंबंध में ‘‘लघुत्रयी’’ में उपस्थित विविध पात्रों की समीक्षा विविध दृष्टियों से की है। कालिदास की तद्विषयक धारणा का विशेष अवबोध इसी का परिणाम है। नौ अध्यायों में विभाजित यह शोद्य-प्रबंध विषय के अनुरूप आयामित हैं। साथ ही साथ अधिक समय के परिश्रम के परिणाम है। 

‘‘लघुत्रयी’’ के प्रसिद्ध कवि कालिदास पर किसी प्रकार का कार्य अपने आप में महत्त्वपूर्ण तो है ही, कवि के परिचयात्मक विवरण के बिना वह अपूर्ण लगता है। परिणामस्वरूप ‘‘प्रथम-अध्याय’’ में कालिदास का परिचयात्मक विवरण उपस्थापित किया गया है। लघुत्रयी से सम्बद्ध अपेक्षित विवरणों को भी यहीं दिया गया है क्योकि संस्कृृत साहित्य में ‘‘लधुत्रयी’’ का एक विशेष महत्त्व है।  

काव्यों के लिए कुछ आवश्यक तत्त्व मान्य है। न केेवल भारतीय काव्यशास्त्रियों ने, अपितु पाश्चात्य काव्यशा़िस्त्रयों नेे भी काव्य के प्रमुख तत्त्वों की ओर संकेत किया है। चरित्र-संकल्पना काव्य तत्त्वों में एक है। जिस कथावस्तु पर काव्य आधारित होता है। वह कथावस्तु किसी न किसी चरित्र से संबंध होती है। चरित्रों की उपस्थिति के संबंध में काव्यशास्त्रीय मान्यताएँ भी उपेक्षणीय नहीं हैं। काव्यों की कथावस्तु का मूल आधार अगर चरित्र को ही कहा जाय, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। ‘‘लधुत्रयी’’ एवं ‘‘चरित्र-संकल्पना’’ से सम्वद्ध शास्त्रीय विवेचन प्रस्तुत शोध-प्रबंध के ‘‘द्वितीय-अध्याय’’ में किया जायेगा। 

‘‘रघुवंश’’ महाकाव्य संस्कृत साहित्य का श्रेष्ठ महाकाव्य है। इसमें रघुवंशीय राजाओं के जीवन-वृत्त। प्रधान रूप में गुम्फित हैं। लगभग 28 से भी अधिक रघुवंशीय राजाओं का जीवन प्रस्तुत करनेवाला यह महाकाव्य चरित्र-संकल्पना की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें दिव्य-अदिव्य तथा दिव्यादिव्य विविध पात्रों की उपस्थिति है। सभी पात्रों का समीक्षण प्रस्तुत शोध-प्रबंध के ‘‘तृतीय-अध्याय’’ में किया जायेगा।

कालिदास का दूसरा महाकाव्य ‘कुमारसम्भव’ है। जिसमें कुमार कार्तिकेय की जन्म कथा विशेष रूप से गुम्फित है। कुमारसम्भव महाकाव्य में सम्प्रति सतरह सर्ग उपलब्ध होते हैं। लेकिन विद्वानों में प्रसिद्धि है, कि इसके प्रथम-आठ सर्ग ही कालिदास की रचना है। कई कालिदास के प्रसिद्ध टीकाकारों ने भी कुमारसम्भव के 8 सर्गों तक ही टीका की है। भाषा की दृष्टि से भी प्रथम -8 सर्ग के बाद की भाषा कुछ भिन्न लगती है। फलतः 8 सर्ग के बाद का अंश प्रक्षेप की आश्ंाका में निमग्न है। इस शोध-प्रबंध में कुमारसंभव का प्रथम- 8 सर्गों का ही संबंध उपस्थापित किया जायेगा। कुमारसंभव में भी दिव्यादिव्य पात्रों की उपस्थिति है। जिनका समीक्षण इस शोध-प्रबंध के ‘‘चतुर्थ-अध्याय’’ में किया जायेगा। 

मेघदूत एक सफल खण्ड-काव्य है। इसमें दूत के माध्यम से संदेश संप्रेषित है। यही कारण है, कि इसे ‘‘दूत-काव्य’’ तथा संदेश-काव्य भी कहा जाता है। इसके पद्य गेय है। कवि की अभिव्यक्ति रागात्मिका है। फलतः इसे गीतिकाव्य भी कहा जाता है। इस गीतिकाव्य में अलका निवासी यक्ष मेघ के द्वारा अपने प्रिया के पास संदेश प्रेषण की घटना मुख्य रूप में वर्णित है। ‘‘मेघदूतम्’’ के काव्यात्मक सौंदर्य इतना अधिक है कि किसी आलोचक ने सच ही कहा है- ‘‘कालिदास इतने ग्रन्थों का प्रणयन नहीं भी करते केवल वे मेघदूत की ही रचना करते, तब भी इनका यश साहित्य जगत मंे इससे कम नहीं होता ’’। मेघदूत में विविध प्रकार के पात्रों की संकल्पना है। जिनमें दिव्य एवं अदिव्य पात्र मूल रूप में आये है। सभी पात्रों का विशद् समीक्षण प्रस्तुत शोध-प्रबंध के ‘‘पंचम-अध्याय’’ में किया जायेगा। 

लधुत्रयी में नायकों की विशिष्ट भूमिका रही है। यों तो तीनों ही काव्यों के नायक अनिर्णीत हैं। एक ओर रघुवंश महाकाव्य जिसमें अनेक रघुवंशीय राजाओं का चित्रण हुआ है, नायक के विवाद से युक्त है। कुछ लोग रघु को इसका नायक मानते है। लेकिन कुछ लोग रघु के अतिरिक्त दूसरे रघुवंशीय राजा को इस महाकाव्य का नायक स्थिर करते हैं। इसी प्रकार कुमारसंभव एवं मेधदूत भी विवाद से रहित नहीं है। ‘‘लधुत्रयी’’ के इन सारे नायकों का समीक्षण संस्कृत साहित्य के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रकृत शोध-प्रबंध के ‘‘छठे-सातवें’’ अध्याय में इन्हीं नायकों का समीक्षण प्रस्तुत किया जायेगा। 

काव्य के आवश्यक तŸव में रस को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। रस ही काव्य की आत्मा है। रस के विना काव्य निर्जीव शरीर की भांति माना जाता है। रस का संबंध पात्रों से होता है, क्यांेकि रसों का आश्रय पात्र ही हैं। महाकाव्य के लक्षण में काव्यशास्त्रियों का विचार है, कि वीर, शृंगार एवं करूण में से किसी एक रस की प्रधानता अपेक्षित है। शेष रसों की अभिव्यक्ति भी महाकाव्य में होनी चाहिए। ज्ञातव्य है, कि काव्य में रसाभिव्यक्ति के लिए पात्रों का योगदान अपेक्षित है। लघुत्रयी के तीनों ही काव्यों में अंगीरस एवं गौणरस की स्थिति पात्रों पर आधारित है। इन रसों के परिपाक में चरित्रों के योग का मूल्यांकन प्रकृत शोध-प्रबंध के ‘‘सप्तम-अध्याय’’ में किया जायेगा । 

लघुत्रयी के पात्रों में बहुत सारे पात्र ऐतिहासिक एवं पौराणिक है। ऐतिहासिक एवं पौराणिक पात्रों का लघुत्रयी में उपस्थापन विशिष्टताओं से सम्पन्न है। ऐतिहासिक एवं पौराणिक पात्र कवि की प्रतिभा के बल पर अपने स्वरूप को विशेष रूप में प्रकाशित कर सका है। तीनों ही काव्यों के पात्र प्रायः ऐतिहासिक एवं पौराणिक जिसका तुलनात्मक समीक्षण प्रस्तुत शोध प्रबंध के ‘अष्टम-अध्याय’ में किया जायेगा। 

प्रस्तुत शोध-प्रबंध के निर्माण में अनेक पुस्तकालयों का योगदान है। बनारस, हिन्दू विश्वविद्यालय पुस्तकालय, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय पुस्तकालय, कांशी विद्यापीठ पुस्तकालय, उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय पुस्तकालय, सींधिया शोध-संस्थान पुस्तकालय उज्जैन, कालिदास अकादमी पुस्तकालय उजैन, पटना विश्वविद्यालय पुस्तकालय, कलकत्ता, केन्द्रीय पुस्तकालय के अतिरिक्त राँची के विविध पुस्तकालयों जैसे - संतुलाल पुस्तकालय, कामिल बुल्के शोध-संस्थान पुस्तकालय, राँची विश्वविद्यालय केन्द्रीय पुस्तकालय, राँची-स्नाकोत्तर विभागीय पुस्तकालय, मारवाड़ी महाविद्यालय पुस्तकालय, राँची का विशेष सहयोग प्राप्त हुआ है। जहाँ से अनेक पुस्तकें उपलब्ध हो सकी हैं, इन संस्थाओं के प्रति हम आभारी हैं, क्योंकि इन संस्थाओं की सहायता के विना मेरा शोध-प्रबंध पूरा नहीं होता। कुछ व्यक्तिगत पुस्तकालयों से भी सहयोग की प्राप्ति हुई है। बनारस के संस्कृत सार्वभौम प्रचार समिति, वासुदेव द्विवेदी जी के पुस्तकालय विशेष रूप से उल्लेखनीय है। हम उनके प्रति भी कृतज्ञता ज्ञापन करते हैं। उज्जैन में प्रतिवर्ष आयोजित कालिदास समारोह में अनेक शोध-पत्र पढ़े जाते हैं। इन शोध-पत्रों का प्रकाशन भी कालिदास समिति के द्वारा हो रहा है। विभिन्न कालिदास समारोहों में पढे़ गये अनेक शोध-पत्रों का सहयोग भी मुझे प्राप्त हुआ है। हम समिति के पदाधिकारी के आभारी तो है हीं जिन्होंने इन शोध-पत्रों को उपलब्ध कराया। उन शोध-पत्रों के शोधकत्र्ताओं के आभारी हैं। भारत के विभिन्न शोधकेन्द्रों से प्रकाशित शोध-ग्रन्थों का भी सहयोग मुझे प्राप्त है। जिसमें एसियार्टिक सोसाइटी, कोलकाता, भाण्डरकर ओरियन्टल रिसर्च इंस्टिट्यूट, पूना, काली प्रसाद जयसवाल रिसर्च इंस्टिच्युट पटना, काबिल बुल्के शोध संस्थान, रांँची आदि के प्रकाशनों का लाभ भी मुझे प्राप्त हुआ है। अखिल भारतीयप्राच्यविद्या महासम्मेलनों में तथा विश्व संस्कृत सम्मेलनों में पढे़ गये शोध-पत्र भी प्रस्तुत शोध-प्रबंध में सहायक हुए हैं। हम सभी संस्थाध्यक्षों एवं गवेषकों के आभारी हैं।

इस शोध-प्रबंध के निर्माण में अनेक शोध-पत्रिकाओं का भी सहयोग लिया गया है। जो विविध विश्वविद्यालयों एवं स्वतंत्रसेवी संस्थाओं के द्वारा प्रकाशित है। शोध - पत्रिकाओं के शोधकत्र्ता मेरे परम सहयोगी है, जिनके प्रति मुझे आभार व्यक्त करना अपेक्षित है। प्रकृति ‘‘शोध-प्रबंध’’ की पूर्णता में कई विद्वानों का सहयोग प्राप्त हुआ है। जिसमें रांँची विश्वविद्यालय के संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ० अयोध्याप्रसाद सिंह, अपने शोध निर्देशक श्री रामाशीष पांडेय, श्री चन्द्रकांत शुक्ल, प्रतिकुलपति (का0 सिं0 सं0 वि0 वि0, दरभंगा) प्राचार्य भगवदत्त मिश्र (गणपति सं0 म0 वि0, राँची) प्राध्यापक लम्वोदर झा (व्याकरणाचार्य) श्री दिनेश पाण्डेय ‘‘दिनमणि’’ सूर्यमुखी आयुर्वेद काॅलेज (संस्थापक) राँची, डाॅ0 वचनदेव कुमार, हिन्दी विभागाध्यक्ष (स्नातकोत्तर) राँची काॅलेज, राँची श्री हरिहर कृपालु जी तथा गुरूवर के ज्येष्ठ सुपुत्र श्री संतोष कुमार पाण्डेय, (सं0 वि0 अध्यक्ष) स्नातक राँची काॅलेज, राँची के प्रति सादर प्रणत एवं कृतज्ञ हूँ। 

परम पूज्य पिता श्री स्व0 पं0 कामेश्वर उपाध्याय शोध ग्रन्थ के प्रेरक मूत्र्त हैं। तथा मेरी पत्नी श्रीमती यमुना पाण्डेय, अपने सुपुत्र श्री मनोज, संजय, रंजीत, संजीत एवं पुत्री पूजा। जो अक्षरावलोकन-पठन, मुद्रणालय-संशोधन, सम्पादन-कार्य में निरत रहे हैं, उन सुहृद् जनों तथा श्री बबलू शर्मा, अमित सिन्हा, टंककद्वय, को सहृदय से सर्वविध अभ्युदय एवं मंगल आर्शीवचन प्रदान करता हूँ।  

प्रस्तुत शोध प्रबंध में प्रधान या आनुसांगिक रूप में भी जिनका सहयेाग लिया गया है, सबों का नाम से उल्लेख करना संभव नहीं, लेकिन मैं उन लोगो का विनम्र आभारी हूँ जिनलोगों के पुस्तकों से मुझे सहायता मिली है, उन पुस्तकों के प्रति भी मैं कृतज्ञता ज्ञापन करता हूँ। 

 

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