Mahaveer Prasad Dwivedi Aur Hindi Navjagaran

Front Cover
Rajkamal Prakashan, Jan 1, 2002 - Hindi literature - 405 pages
द्विवेदी जी ने अपने साहित्यिक जीवन में सबसे पहले अर्थशास्त्र का गहन अध्ययन किया और बड़ी मेहनत से 'संपत्ति शास्त्र' नामक पुस्तक लिखी ! इसीलिए द्विवेदी जी बहुत-से ऐसे विषयों पर टिप्पणियाँ लिख सके जो विशुद्ध साहित्य की सीमाएँ लाँघ जाति हैं ! इसके साथ उन्होंने राजनीतिक विषयों का अध्ययन किया और संसार में हो रही राजनीतिक घटनाओं पर लेख लिखे ! राजनीति और अर्थशास्त्र के साथ उन्होंने आधुनिक विज्ञानं से परिचय प्राप्त किया और इतिहास तथा समाजशास्त्र का अध्ययन गहराई से किया ! इसके साथ भारत के प्राचीन दर्शन और विज्ञानं की ओर ध्यान दिया और यह जानने का प्रयत्न किया कि हम अपने चिंतन में कहाँ आगे बढे और कहाँ पिछड़े हैं ! परिणाम यह हुआ कि हिंदी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना के प्रसार के लिए वह सबसे उपयुक्त व्यक्ति सिद्ध हुए ! उनके कार्य का मूल्याङ्कन व्यापक हिंदी नवजागरण के सन्दर्भ में ही संभव है ! डॉ. रामविलास शर्मा द्वारा रचित इस कालजयी पुस्तक के पांच भाग हैं ! पहले भाग में भारत और साम्राज्यवाद के सम्बन्ध में द्विवेदी जी ने और 'सरस्वती' के लेखकों ने जो कुछ कहा है, उसका विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है ! दूसरे भाग में रूढ़ीवाद से संघर्ष, वैज्ञानिक चेतना के प्रसार और प्राचीन दार्शनिक चिंतन के मूल्याङ्कन का विवेचन है ! तीसरे भाग में भाषा-समस्या को लेकर द्विवेदी जी ने जो कुछ लिखा है, उसकी छानबीन की गई है ! चौथे भाग में साहित्य-सम्बन्धी आलोचना का परिचय दिया गया है ! पांचवे भाग में द्विवेदी-युग के साहित्य की कुछ विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है ! बहुत-सी समस्याएँ जो द्विवेदी जी के समय में थीं, आज भी विद्यमान हैं ! इसीलिए आज के संदर्भ में भी इस पुस्तक की सार्थकता और उपयोगिता अक्षुण्ण है !
 

What people are saying - Write a review

We haven't found any reviews in the usual places.

Contents

Section 1
Section 2
Section 3
Section 4
Section 5
Section 6
Section 7
Section 8
Section 13
Section 14
Section 15
Section 16
Section 17
Section 18
Section 19
Section 20

Section 9
Section 10
Section 11
Section 12
Section 21
Section 22
Section 23
Section 24

Other editions - View all

Common terms and phrases

अंग्रेजी अधिक अनेक अन्य अपनी अपने अब आदि इन इस इसके इसलिए इसी उनका उनकी उनके उन्हें उन्होंने उर्दू उस उसका उसकी उसके उसे एक ऐसा ऐसे ओर और कम कर करके करते करना करने कवि कविता कहते हैं का काम कारण किन्तु किया किसी की कुछ के बारे में के लिए को कोई क्या गई गया चाहिए जब जाता है जाती जातीय जापान जाय जिस जैसे जो तक तब तो था थी थे दिया देते देश द्विवेदी जी ने नहीं है नाम निराला पर पहले प्रकार प्रकाशित फारसी फिर बहुत बात बाद भारत भारतीय भाषा भाषाओं भी में यदि यह यहाँ या ये रहा रहे रूप रूस लिखा लेख लेखक लोग लोगों वह वहाँ विकास विचार वे संस्कृत सकता सब समय सम्बन्ध सरस्वती सरस्वती में साथ साहित्य से हम हिन्दी हिन्दी भाषा ही हुआ हुई हुए है और है कि है है हो होता है होती होने

About the author (2002)

डॉ रामविलास शर्मा 10 अक्तूबर सन् 1912 को ग्राम ऊँचगाँव सानी, जिला-उन्नाव (उत्तर प्रदेश) में जन्मे रामविलास शर्मा ने 1932 में बी.ए., 1934 में एम.ए. (अंग्रेजी), 1938 में पी. एच. डी. (लखनऊ विश्वविद्यालय) की उपाधि प्राप्त की ! लखनऊ विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में पाँच वर्ष तक अध्यापन-कार्य किया ! सन 1943 से 1971 तक आगरा के बलवंत राजपूत कॉलेज में अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष रहे ! बाद में आगरा विश्वविद्यालय के कुलपति के अनुरोध पर के.एम. हिन्दी विद्यापीठ के निदेशक का कार्यभार स्वीकार किया और 1974 में अवकाश लिया। सन 1949 से 1953 तक रामविलासजी अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के महामंत्री रहे ! देशभक्ति तथा मार्क्सवादी चेतना रामविलास जी की आलोचना की केन्द्र-बिन्दु है। उनकी लेखनी से वाल्मीकि तथा कालिदास से लेकर मुक्तिबोध तक की रचनाओं का मूल्यांकन प्रगतिवादी चेतना के आधार हुआ। उन्हें न केवल प्रगति-विरोधी हिन्दी-आलोचना की कला एवं साहित्य-विषयक भ्रान्तियों के निवारण का श्रेय है, वरन् स्वयं प्रगतिवादी आलोचना द्वारा उत्पन्न अन्तर्विरोधों के उन्मूलन का गौरव भी प्राप्त है। साहित्य अकादेमी का पुरस्कार तथा हिन्दी अकादेमी, दिल्ली का शताब्दी सम्मान से सम्मानित। देहावसान: 30 मई, 2000।

Bibliographic information