Bhāratīya bhāshāvij˝āna

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Caikhambā Vidyābhavana, 1959 - India - 331 pages

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अपनी अपने अवधी आगे आज आदि में इन इस लिए इसी तरह उन उस उसी एक कर के कहते हैं कहीं का का विकास काम कारण किया किसी की की जगह की भाषा कुछ के लिए को कोई क्या क्रिया खड़ी बोली गई गए गया है गा गे चलता है चीज जब जा जाए जाती जिस जैसे जो तक तथा तब तो था थी थे दिया दो दोनो धातु नहीं है नाम ने पंजाबी पर परन्तु पहले पाञ्चाली प्रत्यय प्रयोग प्राकृत फिर बन बना बहुत बहुवचन बात ब्रजभाषा भाषा भाषा का भाषा में भाषाएँ भाषाओं भेद मूल में भी यह यहाँ यही या यानी ये राजस्थानी राम लिया ले लोग वर्ग वर्ण वह वहाँ विभक्ति वे शब्द शब्दों संस्कृत संस्कृत में सब समय सर्वत्र साहित्य साहित्यिक से सो स्पष्ट हम हिन्दी में ही हुआ है और है कि हैं हो गया होता है होते

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