Vyadhi - Vigyan (Vol. 2)Motilal Banarsidass Publishing House |
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१० अथवा अधिक अन्त्र अन्य अर्थात् अवस्था आता आदि आमाशय आरम्भ इन इस रोग इसके इसमें उत्पन्न एक ऐसी ऐसे औंस कई कभी कभी-कभी कम कर करना करने कला कहते हैं का काल किसी की कुछ के कारण के लिए केवल को कोई गति ग्रेन चाहिए चिकित्सा जब जाती जाते हैं जाने जाय जीर्ण जो ज्वर ड्राम तक तथा तब तरल तीव्र तो दें देना देने दो द्वारा नहीं नहीं होता नीचे पर परन्तु पहले पीड़ा प्रकार प्रतीत प्रायः प्रोटीन बढ़ बहुत बाद बार बाहर भाग भी भोजन मात्रा मिनिम मूत्र में में भी यकृत् यथा यदि यह रोग या ये रक्त रस रहता है रहती रूप रोगी रोगी को लक्षण लगता है लाभ वसा वह विशेष वेग शरीर शोथ समय साथ से स्थान ही हृदय है और है कि हो जाता है हो तो होकर होता है होती होते हैं होने دو



