KavyodhanavMotilal Banarsidass Publishing House |
Contents
Section 1 | 7 |
Section 2 | 9 |
Section 3 | 14 |
Section 4 | 16 |
Section 5 | 18 |
Section 6 | 31 |
Section 7 | 33 |
Section 8 | 46 |
Section 19 | 140 |
Section 20 | 150 |
Section 21 | 155 |
Section 22 | 170 |
Section 23 | 204 |
Section 24 | 210 |
Section 25 | 226 |
Section 26 | 231 |
Section 9 | 48 |
Section 10 | 55 |
Section 11 | 62 |
Section 12 | 63 |
Section 13 | 66 |
Section 14 | 77 |
Section 15 | 110 |
Section 16 | 115 |
Section 17 | 123 |
Section 18 | 134 |
Section 27 | 236 |
Section 28 | 239 |
Section 29 | 243 |
Section 30 | 252 |
Section 31 | 271 |
Section 32 | 273 |
Section 33 | 293 |
Section 34 | 294 |
Section 35 | |
Common terms and phrases
१० ११ १२ १३ १४ १५ १६ १७ १८ २० २१ इति इह एव एहि कथं कलौ कालो हि नायं कि कीदृग् वसन्तोत्सवः कुरु के को खलु गुरु चिरं जगति जननी जय जयति जयतु तं तत् स्वतन्त्रम् तत्र तथा तदा तम् तव तस्य तां तु ते ते हितैषिणः तेन त्वं त्वया त्वां देव देवी द्रुतं ध्रुवम् नु नृणां नो परं परम् परस्मैपदम् पार्वती पुनः पूर्व प्रातः बत ब्रह्म भक्त्या भजे भवतः भवता भवति भवते भवन्तः भारतं भुवनम् भुवि मङ्गलं मङ्गलम् मम मया मयि मा माता मुदा मे यः यत् यत्र यथा यदि यस्य या युगधर्मानुसारतः ये येन यो लोके वः वन्दे वयं वा विजयते विभाति विभो शयितु ं वयस्याः शरणं श्रेयसे सखे सततं सतां सत्यं सदा सन्ति न ते सर्वे संस्कृतं सह सा साधु साम्प्रतं सुरगवी सूत्र स्म स्वयं स्वागतं हा हि नायं शयितु हृदयं हृदा हृदि ह्य



