Skandgupta

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Rajkamal Prakashan, Sep 1, 2007 - 165 pages
प्रसादजी के उपन्यास तितली की कहानी एकसाथ कई स्तरों पर चलती है। एक तरफ उसमें भारतीय जीवन-दृष्टि तथा पाश्चात्य जीवन-दृष्टि की टकराहट है तो दूसरी तरफ किसान और जमींदार का संघर्ष है। लेकिन जैसाकि नाम से ही विदित है, कथा के केन्द्र में तितली नामक युवती है जिसे भारतीय नारी के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह समर्पणमयी है किन्तु नारी की अस्मिता के प्रति पूर्ण सचेत भी है। पाश्चात्य जीवन-दृष्टि का प्रतिनिधित्व शैला करती है, जिसे प्रसाद जी ने उसकी पूरी गरिमा के साथ प्रस्तुत किया है। वह इन्द्रदेव को चाहती है किन्तु उसे अपना नहीं पाती और स्वातंत्रय की खोज में भटकती रहती है।
 

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Jai Shankar Prasad

Contents

Section 1
4
Section 2
5
Section 3
30
Section 4
34
Section 5
35
Section 6
37
Section 7
72
Section 8
104
Section 9
125
Section 10
147

Common terms and phrases

अच्छा अपना अपनी अपने अब अभी अयोध्या अरी आज इन इस इसका इसी उल्लेख उस उसका उसके उसी उसे एक औन और करके करता करते करना करने के कहाँ का का प्रवेश कालिदास किसी की की जय कुछ कुमारगुप्त के लिए केवल को कोई क्या क्यों गया गो चाहिए जब जय हो जयमाला जा जाता है जिस जीवन जो तक तब तुम तुमने तू तो था थी थे दिया देखकर देवकी देश दो द्वारा धर्म नहीं है नाम ने पर परंतु परत परम प्रमाण फिर बया बात भारत भी मगध मदान मालव मुझे मुदगल में मेरा मेरी मैं यदि यय यया यह यही यहीं युद्ध युवराज रघुवंश रहा है रही रहे राज्य रामा ले वया वह वही विक्रमादित्य विजय विजया विपत वे शर्वनाग सब समय साथ से सेना सैनिक स्वयं हम हिमालय ही हुआ हुई हुए है कि है रे हैं होकर होगा होगी होता है होने

About the author (2007)

जन्म : 30 जनवरी 1890, वाराणसी (उ.प्र.)। स्कूली शिक्षा मात्र आठवीं कक्षा तक। तत्पश्चात् घर पर ही संस्कृत, अंग्रेजी, पालि और प्राकृत भाषाओं का अध्ययन। इसके बाद भारतीय इतिहास, संस्कृति, दर्शन, साहित्य और पुराण-कथाओं का एकनिष्ठ स्वाध्याय। पिता देवीप्रसाद तम्बाकू और सुँघनी का व्यवसाय करते थे और वाराणसी में इनका परिवार 'सुँघनी साहू’ के नाम से प्रसिद्ध था। पिता के साथ बचपन में ही अनेक ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों की यात्राएँ कीं। छायावादी कविता के चार प्रमुख उन्नायकों में से एक। एक महान लेखक के रूप में प्रख्यात। विविध रचनाओं के माध्यम से मानवीय करुणा और भारतीय मनीषा के अनेकानेक गौरवपूर्ण पक्षों का उद्घाटन। 48 वर्षों के छोटे-से जीवन में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबन्ध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाएँ। प्रमुख रचनाएँ : झरना, आँसू, लहर, कामायनी (काव्य); स्कन्दगुप्त, अजातशत्रु, चन्द्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, जनमेजय का नागयज्ञ, राज्यश्री (नाटक); छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आँधी, इन्द्रजाल (कहानी-संग्रह); कंकाल, तितली, इरावती (उपन्यास)। 14 जनवरी, 1937 को वाराणसी में निधन।

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