उत्तरकाण्ड प्रसंग एवं संन्यासाधिकार विमर्श

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Shri Bhagavatananda Guru, Aug 14, 2020 - Religion - 330 pages
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उत्तरकाण्ड प्रसङ्ग एवं संन्यासाधिकार विमर्श नाम की यह पुस्तक चित्रकूट के तुलसी पीठाधीश्वर श्री रामभद्राचार्य जी के अशास्त्रीय वक्तव्य एवं धारणाओं का बचाव करने वाले उनके पक्षधरों के विरुद्ध निग्रहाचार्य श्रीभागवतानंद गुरु के द्वारा लिखी गयी है | इस पुस्तक में उत्तरकाण्ड एवं उसके प्रसंगों को प्रामाणिक सिद्ध करते हुए श्रीभागवतानंद गुरु ने श्री रामभद्राचार्य जी के संन्यासी या जगद्गुरु होने के अधिकार एवं औचित्य पर प्रश्नचिह्न खड़े किये हैं | इस पुस्तक में सनातन धर्म के ग्रंथों में प्रक्षिप्त अंशों की संभावना व्यक्त करने वाले मत का भी खंडन किया गया है |
 

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This book is probably written by a man who has buried his God-given wisdom under old books and lost his ability to think of something new. If a person with an intuitive mind reads this book, then he will be filled with negativity not only towards the author but also towards Hindutva. Such books seem to be written to vent personal frustrations. Completely a waste of time.
Instead of bringing positive changes in the society, a person suffering from the means of attaining heaven himself commits such misdeeds. Consider it the Islamic version of Hindutva.
 

Common terms and phrases

अथवा अध्याय अपनी अपने अब अर्थ अलग आदि आप इस इसका इसके इसीलिए उत्तरकाण्ड उनके उन्हें उन्होंने उस उसका उसके उसे एक एवं ऐसा ऐसे और कर करके करता करते करना करने कहते हैं कहा का किन्तु किया किसी की कुछ के कारण के द्वारा के लिए के साथ केवल को कोई क्या क्यों क्योंकि गए गुरु ग्रंथों चाहिए जब जाता है जी के जी ने जैसे जो तक तथा तो था थी थे दण्ड दिया दे धर्म नहीं है नाम पर पहले पुत्र पुराण प्रक्षिप्त प्रमाण प्राप्त फिर बहुत बात बाद बुद्ध ब्राह्मण भगवान् भी में में ही मेरे मैं मैंने यदि यह यहां या ये रहा रहे राजा राम रामजी रामायण रूप लोग लोगों वर्णन वह वाले वाल्मीकि विषय वे व्यक्ति श्लोक संन्यास सकता सब सभी समय सीताजी से स्वयं हम ही ही नहीं हुआ हुए हूँ है और है कि हो होगा होता है होने

About the author (2020)

श्रीमन्महामहिम विद्यामार्तण्ड श्रीभागवतानंद गुरु (श्रीनिग्रहाचार्य) भारत के वरिष्ठ धर्माधिकारी एवं लेखक हैं | बाल्यकाल से ही सनातन धर्म के ग्रन्थों एवं विषयों पर व्याख्यान तथा लेखन करना इनकी विशेषता रही है | इन्होंने हिन्दी, अंग्रेजी और संस्कृत में अनेकों पुस्तकों का लेखन किया है |

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