Amarbel: Bestseller Book by Vrindavan Lal Verma: Amarbel

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Prabhat Prakashan, Jan 1, 1993 - Fiction - 320 pages
अध्यात्मवाद? अध्यात्मवाद न?'

' न भाई, बहस के लिए नहीं लिवा लाया हूँ । बहस ही करनी होती तो पैवलाव नाम के तुम्हारे मान्य विदेशी से शुरू करता, जिसके सिद्धांत प्राणी विज्ञान शास्त्र में तो सर्वमान्य हैं-'

'परंतु..'

'परंतु मनोविज्ञान के क्षेत्र में संदेह उत्पन्न करनेवाले...'

'जैसे?'

'ऐसे-वेद शब्द का चाहे लोग अर्थ तक न जानते हों, परंतु है वह इन्हें मान्य, उसके दो-तीन वाक्य समझाकर रटा दो। ओंखें खुल जाएँगी और काम करते रहने की बान पड़ जाएगी। यह भी एक फॉर्मूला है, लेकिन फॉर्मूला ऑफ कंपलशन से कहीं अच्छा।'

टहल हँस पड़ा, 'भौतिकवाद को हराने की अध्यात्मवाद की वही पुरानी चाल। ढोंग की पूजा कराने का ढंग!'

'सो नहीं है। साथ मिलकर चलो, मिलकर बोलो, मिलकर पदार्थों का भोग करो-यह सब क्या ढोंग है? अगर समाज हमारे-तुम्हारे चिल्लाने से नहीं जागता तो उसके कान पर शंख क्यों न फूकें? लेकिन तुम्हें यहाँ का शंख पसंद नहीं है-बाहर की बिगुल अच्छी लगती है।'

 

Contents

Section 1
5
Section 2
7
Section 3
9
Section 4
27
Section 5
35
Section 6
39
Section 7
164
Section 8
165
Section 11
237
Section 12
238
Section 13
242
Section 14
247
Section 15
305
Section 16
317
Section 17
319
Section 18
320

Section 9
173
Section 10
191
Section 19
Copyright

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Common terms and phrases

अंजना अपना अपनी अपने अब अभी आई आगे आप आया इन इस उन उस उसका उसकी उसके उसने उसे एक ओर और कभी कर करके करने कहीं का काम कि किया किसी की की बात कुछ के लिए के साथ को कोई क्या खेत गई गए गाँव घर घाटीवाली चला चाहिए छदामी जनक जब जा जाने जैसे जो टहल टहल ने टहलराम तक तब तुम तो था थी थीं थे दमरू दिन दिया दी दे देशराज ने दो दोनों धरनीधर नहीं ने कहा पड़ पड़ा पड़े पर परंतु पहले पास पुलिस फिर बटोले बनमाली बहुत बाघराज बोला भी भीतर भूमि मंटू मन मुझे में मेरे मैं यह यहाँ या ये रहा था रही रहे राघवन राजदुलारी रुपया लगा लिया ले लोग लोगों वह वहाँ विक्रम वे सनेही ने सब समय समिति सहकारी साहब सुहाना से हम हरको हाथ ही हुआ हुई हुए हूँ है हैं हो गया होगा

About the author (1993)

मूर्द्धन्य श्री वृंदावनलाल वर्मा का जन्म १ जनवरी, १८८१ को मऊरानीपुर ( झाँसी) में एक कुलीन श्रीवास्तव कायस्थ परिवार में हुआ था। इतिहास के प्रति वर्माजी की रुचि बाल्यकाल से ही थी। अत : उन्होंने कानून की उच्च शिक्षा के साथ-साथ इतिहास, राजनीति, दर्शन, मनोविज्ञान, संगीत, मूर्तिकला तथा वास्तुकला का गहन अध्ययन किया। ऐतिहासिक उपन्यासों के कारण वर्माजी को सर्वाधिक ख्याति प्राप्त हुई। उन्होंने अपने उपन्यासों में इस तथ्य को झुठला दिया कि 'ऐतिहासिक उपन्यास में या तो इतिहास मर जाता है या उपन्यास', बल्कि उन्होंने इतिहास और उपन्यास दोनों को एक नई दृष्टि प्रदान की। उनकी साहित्य सेवा के लिए भारत सरकार ने आपको 'पद्म भूषण' की उपाधि से विभूषित किया; आगरा विश्वविद्यालय ने डी. लिट्. की मानद उपाधि प्रदान की । उन्हें 'सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार' से सम्मानित किया गया तथा 'झाँसी की रानी' उपन्यास पर भारत सरकार ने दो हजार रुपए का पुरस्कार प्रदान किया। इनके अतिरिक्त उनकी विभिन्न कृतियों के लिए विभिन्न संस्थाओं ने भी उन्हें सम्मानित व पुरस्कृत किया। वर्माजी के अधिकांश उपन्यासों का प्रमुख प्रांतीय भाषाओं के साथ-साथ अंग्रेजी, रूसी एवं चैक भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है। आपके उपन्यास 'झाँसी की रानी' तथा 'मृगनयनी' का फिल्मांकन भी हो चुका है।

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