Krantikari Kosh: Chaturtha Khand

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Prabhat Prakashan, Jan 1, 1998 - Biography & Autobiography - 350 pages
इस श्रमसिद्ध व प्रज्ञापुष्ट ग्रंथ क्रांतिकारी कोश में भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास को पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है ।
सामान्यतया भारतीय स्वातंत्र्य आदोलन का काल 1857 से 1942 ई. तक माना जाता है; किंतु प्रस्तुत ग्रंथ में इसकी काल- सीमा 1757 ई. (प्लासी युद्ध) से लेकर 1961 ई. (गोवा मुक्ति) तक निर्धारित की गई है । लगभग दो सौ वर्ष की इस क्रांति- यात्रा में उदभट प्रतिभा, अदम्य साहस और त्याग-तपस्या की हजारों प्रतिमाएँ साकार हुईं । इनके अलावा राष्ट्रभक्त कवि, लेखक, कलाकार, :  विद्वान और साधक भी इसी के परिणाम-पुष्प हैं ।

पाँच खंडों में विभक्त पंद्रह सौ से अधिक पृष्ठों का यह ग्रंथ क्रांतिकारियों का प्रामाणिक इतिवृत्त प्रस्तुत करता है । क्रांतिकारियों का परिचय अकारादि क्रम से रखा गया है । लेखक को जिन लगभग साढ़े चार सौ क्रांतिकारियों के फोटो मिल सके, उनके रेखाचित्र दिए गए हैं । किसी भी क्रांतिकारी का परिचय ढूँढने की सुविधा हेतु पाँचवें खंड के अंत में विस्तृत एवं संयुक्त सूची (सभी खंडों की) भी दी गई है ।
भविष्य में इस विषय पर कोई भी लेखन इस प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ की सहायता के बिना अधूरा ही रहेगा ।
 

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Contents

Section 1
5
Section 2
17
Section 3
66
Section 4
73
Section 5
84
Section 6
85
Section 7
100
Section 8
130
Section 16
174
Section 17
189
Section 18
197
Section 19
206
Section 20
213
Section 21
220
Section 22
228
Section 23
249

Section 9
140
Section 10
142
Section 11
151
Section 12
153
Section 13
167
Section 14
168
Section 15
173
Section 24
251
Section 25
286
Section 26
292
Section 27
307
Section 28
340
Section 29
350
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Common terms and phrases

१९४२ अंदर अगस्त अन्य अपना अपनी अपने अशफाक आंदोलन आप इस उन उनकी उनके उन्हें उन्होंने उस उसका उसकी उसके उसने उसे एक ओर और वह कर दिया करके करते करने के कहा का काम किया की कुछ के कारण के लिए के साथ को कोई क्या क्रांति क्रांतिकारियों क्रांतिकारियों के क्रांतिकारी गए गया और गया था गोलियाँ गोली चला जब जा जाने जिले के जुलूस जेल में जो तक तथा तो था और था कि थी थीं दंड दल दिन दिया गया दी दे दो दोनों नहीं नाम पड़ा पर पहले पहुँच पास पिता पुलिस ने प्रारंभ फाँसी फिर बहुत बात बाहर भाग भारत भी मृत्यु में ही मैं यह रखा रहा था रहे थे रूप लगा लगे लिया ले लेकर लोग लोगों वर्ष वह वहाँ वे सन् सभी समय साहब सिंह से स्टेशन हम हाथ ही हुआ था हुई हुए है हैं हो गई हो गया होने

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