पूर्णता से पूर्णता तक: (ईशावास्य उपनिषद पर आधारित)

Front Cover
Book Bazooka Publication, Jul 12, 2024 - Juvenile Nonfiction

ये किताब पूर्णता से पूर्णता तक, पूज्यनीय अनंत श्री के द्वारा ईशावास्य उपनिषद पर बोले गए talks का संकलन है। अनंत श्री आज के समय के आधुनिक, आध्यात्मिक, प्रबुद्ध गुरु हैं। उनके द्वारा बोले गए बहुत से audio/ video YouTube पर upload हैं, जिनके माध्यम से देश विदेश में लाखों लोग उनसे जुड़े हैं और उनकी देशनाओं का लाभ उठा रहे हैं। उनके शब्द अंधेरी रात में करोड़ों दीपों के जलने के समान हैं, जो अपनी रोशनी से हर मन को प्रकाशित कर रहे हैं।

उन्होंने पुराने साहित्यों, वेदों, उपनिषदों पर आज के मन के अनुसार सरल और सहज व्याख्याएं दी हैं, जिन में अष्टावक्र गीता, विज्ञान भैरव तंत्र और ताओ ते चिंग पर दी गई देशनायें popular हैं। उनके अनुसार सत्य एक ही था, है और रहेगा। देश तथा काल के अनुसार उसे समझाने वाले और समझने वाले लोग बदलते रहेंगे। अनेक रूपों और माध्यमों से उस एक ही सत्य की अभिव्यक्ति की जाती रही है और रहेगी। हमारे ऋषियों ने जीवन के सत्य बताने वाले अनेक काव्य और ग्रंथों की रचना की। आधुनिक जनमानस के लिए उनको समझना बहुत कठिन है और उसे गलत समझ लेने की बहुत संभावना है, जिससे कोई भटकाव और मूढ़ताओं में फंस सकता है। अनंत श्री द्वारा दिया गया सारा ज्ञान अकर्ता की समझ पर आधारित है। अलग अलग कोणों से, अलग अलग तरीकों से उन्होंने यही समझाने की कोशिश की है कि मनुष्य कुछ नहीं करता, सब कुछ स्वयं ही हो रहा है और वह स्वयं को कर्ता मान कर दुखी सुखी होता रहता है। यही सत्य है और भारतीय मनीषियों ने अनंत काल से यही समझाने की कोशिश की है। ईशावास्य उपनिषद के माध्यम से भी ऋषियों ने यही कहा है। जिसे अनंत श्री ने सरल भाषा और उदाहरणों से हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है। जिस प्रकार मां अपने बच्चे के मन और आवश्यकताओं को समझ कर उसके अनुसार उसे भोजन परोसती है, उसी प्रकार अनंत श्री अपने शिष्यों और श्रोताओं के प्रति प्रेमवश इस प्राचीन अमूल्य ज्ञान को, उन के अनुसार सरल बनाकर प्रस्तुत करते हैं।

यह एक सम्बुद्ध गुरु का प्रेम ही है, जो शब्दों और आशीर्वाद के रूप में हर मन में सम्माहित होता है। अनंत श्री ने अपनी सारी देशनाओं में प्रेम, शांति, प्रसन्नता और समस्वरता की बात की है। उनके अनुसार हर इंसान अपने जीवन में इन्हीं की तलाश में है। जिस इंसान के जीवन में ये चार स्तंभ सशक्त और अटूट हैं, वही मुक्त है। जीवन के संघर्ष और अवसाद में लिप्त मनुष्य के लिए यह संग्रह अमूल्य है। जीवन में इस ज्ञान को समझ कर हर कोई हमेशा आनंद में जी सकता है।

यह मेरा सौभाग्य है कि मैं अनंत श्री के सान्निध्य और मार्गदर्शन में इस संकलन में अपना योगदान दे सकी। मेरे गुरु को कोटि कोटि नमन एवं धन्यवाद। यही आशा करती हूँ कि मेरी तरह अनंत श्री को पढ़ने और सुनने वाले, हर किसी के जीवन में स्पष्टता, शान्ति और प्रेम के फूल खिलेंअर्चना कौशिक

(संपादक की ओर से)

।


 

Selected pages

Common terms and phrases

अगर अपनी अपने अब अभी अस्तित्व इस इसीलिए उनको उपनिषद उस उसका उसकी उसके उसको उसमें उसी ऋषि एक ऐसा ऐसे कभी कर करता है करते करने करें कह रहे कहते हैं कहा कहीं का किया किसी की की तरफ कुछ के लिए को कोई क्या क्योंकि गए चाहिए चेतना जब जा जाता है जाती जाते हैं जीवन में जैसे जो ज्ञान ढंग तरह तो वो था थी थे दिया देखें नहीं है ने पर पहले पूर्ण प्रकट फिर बस बहुत बात भारत भी भीतर में मैं यह यहाँ पर या यानी कि ये रहा है रही रहे हैं लगता है ले लेकिन लोग वह वही वाला विद्या वो व्यक्ति शब्द शरीर सकते सब सब कुछ साथ सारी सारे सूत्र से हम हमको हमने हमारे हर ही ही नहीं हुआ हुए हूँ है और है कि है तो है वो हो गया होगा होता है होती होते होने

About the author (2024)

Anant Sri is one of the most revered, inspiring and visionary Spiritual Masters in the world today. Anant Sri’s profound yet simple teachings, and his humble, compassionate and transforming presence has helped many and continues to help many to experience the vibrantly alive, peace, happiness, love, and harmony in their daily lives. His teaching focuses on the non-doer nature, power of presence and meditativeness.

Anant Sri carries the eternal wisdom of the buddhas which is a simple science of transformation.He is a flowing river of ultimate awakening where we can find the true essence of eternal life.His only concern is the suffering of humanity and end of suffering through the ultimate understanding of our true nature which brings peace, love, happiness and harmony in daily living.

Anant Sri belongs to the Eternity, he does not belong to any new or age old traditions or sects. He is a part of the eternal evolution of the human consciousness. He belongs to the eternal moment of ‘Now’, living in the eternal present.

अनंत श्री एक सम्बुद्ध रहस्यदर्शी हैं जो सम्बुद्ध सदगुरुओं की अनंत धारा में एक खूबसूरत मोड़ की तरह प्रकट हुए हैं। अनंत श्री किसी धर्म या परंपरा से सम्बंधित नहीं हैं। वह धार्मिकता की दिव्य सुगंध से भरे हुए हैं जो किसी भी धर्म से परे है। वो बस बुद्धत्व का शुद्ध प्रकाश हैं। ये प्रकाश बिना किसी भेदभाव या सीमा के सभी को प्रकाशित करता है। उनका जीवन दर्शन व सन्देश कोई सिद्धांत, मत या वाद नहीं है। वह तो रूपांतरण का विज्ञान है।

उनकी देशना आंतरिक रूपांतरण के जीवन दर्शन की सतत प्रवहमान धारा है जो अध्यात्म और विज्ञान के दोनों किनारों के बीच बह रही है। इस जीवनदर्शन को आत्मसात करते ही एक नए मनुष्य, नयी मनुष्यता और नयी अंतर्दृष्टि के जन्म की अनंत संभावनाएं जागृत हो जाती हैं और चेतना की खिलावट प्रारंभ हो जाती है।

अनंत श्री अनंत की पुकार हैं, आलोक आमंत्रण हैं और अनंत पथ के मित्र हैं। वो अस्तित्व की चिरंतन करुणा का कायामय रूप हैं। यह करुणा कभी कोमल स्पर्श की तरह हमारे प्राणों को सहलाती है और कभी कठोर होकर हमारी कठोरता को चूर चूर कर देती है। कभी शीतल समीर की तरह यह करुणा हमें गहरे विश्राम में ले जाती है और कभी तेज़ तूफान की तरह हमें भीतर तक झकझोर जाती है।

यह करुणा कभी शुभ्रा ज्योत्स्ना और तारों से झरते सुकोमल प्रकाश की तरह हमारा पथ आलोकित करती है और कभी किसी महासूर्य के तीव्र प्रकाश की तरह हमें चकाचौंध कर जाती है, जिसके पश्चात हम देर तक आँखें मलते रह जाते हैं।

इस करुणा का रूप चाहे जैसा भी हो, इसका उद्देश्य एक ही है – जागरण, परिपूर्ण जागरण। इस करुणा में एक ही भाव निनादित है कि चेतना का सूर्य सबके जीवन में उदित हो और आत्मस्मरण घटे।

अनंत श्री की प्रेमपूर्ण उपस्थिति से ऐसा प्रतीत होता है कि भारत की दिव्य अंतरात्मा एक बार पुनः जीवित हो गयी है। उनके अंतरानुभव से उभरती वाणी का एक-एक शब्द चेतना का दीया बनकर खोजी साधकों के अंधियारे पथ पर जलने लगता है। उनके माध्यम से प्रकट हुआ अक्षर-अक्षर सम्बुद्ध चेतना के अंतरानुभव से निकला है।

अनंत श्री की आवाज़ में आज के समय की आवाज़ सुनाई देती है। इसमें जीवन के परमबोध का संगीत सुनाई देता है। इस आवाज़ से हमारी नींद टूटती है, स्वप्न विलीन होते हैं और ख़ामोशी से उठती सुगंध की तरह यह एहसास हमें हर ओर से घेर लेता है कि सत्य कभी “था” नहीं होता, सत्य “है”।

उनका होना विशुद्ध वर्तमान में है, इसीलिए ही उनके सान्निध्य में रहते हुए हम सहजता से वर्तमान में रहने की कला सीख लेते हैं। उनके शब्द हमें निःशब्द की ओर ले जाते हैं, उनके विचार हमें निर्विचार की ओर ले जाते हैं और उनकी उपस्थिति हमें शून्यता के आयाम में ले जाती है।

मनुष्य के भीतर विस्मृत हो गए अमृत का स्मरण दिलाने के लिए पुनः एक आध्यात्मिक पुनरुत्थान के अभियान का प्रारंभ उनके माध्यम से हुआ है।


Bibliographic information