Parampara Ka Mulyankan

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Rajkamal Prakashan, Jan 1, 2002 - 252 pages
प्रगतिशीलता के सन्दर्भ में परंपरा-बोध एक बुनियादी मूल्य है, फिर चाहे इसे साहित्य के परिप्रेक्ष्य में रखा- परखा जाय अथवा समाज के। दूसरे शब्दों में बिना साहित्यिक परंपरा को समझे न तो प्रगतिशील आलोचना और साहित्य की रचना हो सकती है और न ही अपनी ऐतिहासिक परंपरा से अलग रहकर कोई बड़ा सामाजिक बदलाव संभव है। लेकिन परंपरा में जो उपयोगी और सार्थक है, उसे उसका मूल्यांकन किए बिना नहीं अपनाया जा सकता। यह पुस्तक परंपरा के इसी उपयोगी और सार्थक की तलाश का प्रतिफलन है। सुविख्यात समालोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने जहाँ इसमें हिन्दी जाति के सांस्कृतिक इतिहास की रूपरेखा प्रस्तुत की है, वहीं अपने-अपने युग में विशिष्ट भवभूति और तुलसी की लोकाभिमुख काव्य-चेतना का विस्तृत मूल्यांकन किया है। तुलसी के भक्तिकाव्य के सामाजिक मूल्यों का उद्घाटन करते हुए उनका कहना है कि दरिद्रता पर जितना अकेले तुलसीदास ने लिखा है उतना हिन्दी के समस्त नए-पुराने कवियों ने मिलकर न लिखा होगा। भवभूति के संदर्भ में रामविलासजी का यह निष्कर्ष महत्त्वपूर्ण है कि ‘यूनानी नाटककारों की देवसापेक्ष न्याय-व्यवस्था की जगह देवनिरपेक्ष न्याय-व्यवस्था का चित्रण शेक्सपियर से पहले भवभूति ने किया’ और रामायण-महाभारत के नायकों के विषय में यह कि ‘राम और कृष्ण दोनों श्याम वर्ण के पुरुष हैं’। वस्तुतः इस कृति में, आधुनिक साहित्य के जनवादी मूल्यों के संदर्भ में, प्राचीन, मध्यकालीन और समकालीन भारतीय साहित्य में अभिव्यक्त संघर्षशील जनचेतना के उस विकासमान स्वरूप की पुष्टि हुई है जो शोषक वर्गों के विरुद्ध श्रमिक जनता के हितों के प्रतिबिम्बित करता रहा है।
 

Contents

Section 1
5
Section 2
7
Section 3
9
Section 4
16
Section 5
45
Section 6
57
Section 7
74
Section 8
90
Section 12
119
Section 13
125
Section 14
129
Section 15
143
Section 16
155
Section 17
174
Section 18
188
Section 19
196

Section 9
96
Section 10
102
Section 11
110
Section 20
209
Section 21
218
Section 22

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Common terms and phrases

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About the author (2002)

डॉ रामविलास शर्मा 10 अक्तूबर सन् 1912 को ग्राम ऊँचगाँव सानी, जिला-उन्नाव (उत्तर प्रदेश) में जन्मे रामविलास शर्मा ने 1932 में बी.ए., 1934 में एम.ए. (अंग्रेजी), 1938 में पी. एच. डी. (लखनऊ विश्वविद्यालय) की उपाधि प्राप्त की ! लखनऊ विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में पाँच वर्ष तक अध्यापन-कार्य किया ! सन 1943 से 1971 तक आगरा के बलवंत राजपूत कॉलेज में अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष रहे ! बाद में आगरा विश्वविद्यालय के कुलपति के अनुरोध पर के.एम. हिन्दी विद्यापीठ के निदेशक का कार्यभार स्वीकार किया और 1974 में अवकाश लिया। सन 1949 से 1953 तक रामविलासजी अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के महामंत्री रहे ! देशभक्ति तथा मार्क्सवादी चेतना रामविलास जी की आलोचना की केन्द्र-बिन्दु है। उनकी लेखनी से वाल्मीकि तथा कालिदास से लेकर मुक्तिबोध तक की रचनाओं का मूल्यांकन प्रगतिवादी चेतना के आधार हुआ। उन्हें न केवल प्रगति-विरोधी हिन्दी-आलोचना की कला एवं साहित्य-विषयक भ्रान्तियों के निवारण का श्रेय है, वरन् स्वयं प्रगतिवादी आलोचना द्वारा उत्पन्न अन्तर्विरोधों के उन्मूलन का गौरव भी प्राप्त है। साहित्य अकादेमी का पुरस्कार तथा हिन्दी अकादेमी, दिल्ली का शताब्दी सम्मान से सम्मानित। देहावसान: 30 मई, 2000।

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